जल्दी जल्दी कार्य योजना में बदलाव से अपेक्षित परिणाम मिलने में कठिनाई
किसी भी कार्य को करने के, हो सकता कई तरीके हो, पर यदि आप जल्दी जल्दी उसके बनावट में या कामो के डिजाइन में परिवर्तन करेंगे तो उसके परिणाम प्रभावित होगे, या जो आप चाहते वह नहीं मिल पायेगा, इसलिए सोच समझकर निर्णय ले और फिर पूरी तरह से उसको कार्यन्वित करें। शिक्षा में तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अपने विद्यार्थी जीवन को याद करता हूँ तो पाता हूँ कि तब स्कूलो में पढाई और केवल पढाई पर ही जोर होता था। आज स्कूलों में तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं । समय बदला, सरकारें बदली और हर सरकार ने शिक्षा में नवाचार करना आरम्भ किया, नवाचार करना अच्छी बात है लेकिन उस नवाचार को एक बार में किया और उसकी दूसरी बार कोई खैर खबर दुबारा नहीं देखी और न उसकी व्यवस्थाये देखी , उसका परिणाम यह हुआ शिक्षा लेने व देने में गिरावट देखी जा रही है। हर सरकार कुछ नया करना चाहती है पर सबसे खराब स्थिति यह है कि जब कोई दूसरी सरकार आती तो जो काम पहले की सरकारो द्वारा आरम्भ किया गया है, उस पर ध्यान न देना या उसे उपेक्षित रखना, यह सबसे खराब स्थिति है, मै किसी भी एक सरकार के बारे में नहीं कह रहा हूँ अक्सर ऐसा देखने में आया है। हर सरकार कुछ अच्छा करना चाहती है। शिक्षा में गुणवत्ता को बढाने के लिए माडल स्कूल नामित किये गये, अच्छी बात है ये तय किया गया कि इन प्राथमिक माडल स्कूलों में चयन करके सभी विषयों के शिक्षक भेजे जायेंगे व 5 कक्षाओं के लिए(कक्षा 1 से लेकर कक्षा 5 तक ) 5 शिक्षक व एक प्रधानाध्यापक भी नियुक्त किये गये और भविष्य में भी नियुक्त होते रहेंगे , कुछ स्कूल में यह काम हुआ भी और इसका परिणाम अच्छा भी रहा, इन स्कूलों मे छात्रों की संख्या में इजाफा भी हुआ, लोग इनसे ख़ुश भी थे, लेकिन अनुश्रवण, लगातार समीक्षा न होने से धीरे-धीरे यह योजना (माडल स्कूलों की) परवान न चढ़ी, अब भी यदि जिन प्राथमिक स्कूल में पूरे 5 +1 शिक्षक है तो वह अच्छा परिणाम दे रहे हैं ।राज्य सरकार द्वारा जवाहर नवोदय विविद्यालय की तर्ज पर राजीव गांधी विद्यालय खोले गये ,लेकिन इसमें , आज तक उसके संचालन के लिए कोई पूर्णकालीन योजना न बनने से जैसे - तैसे ये चल रहे हैं , राजीव गांधी विद्यालय में प्रधानाचार्य के लगभग सभी जगहों पर पद खाली है, हो सकता हो कुछ जगह पर प्रतिनियुक्ति कर दी गयी हो , इन में शिक्षकों के चयन की भी कोई योजना नहीं दिखाई देती है, फिर एक और योजना अटल उत्कृष्ट स्कूल जिन्हें cbse की तर्ज पर ही उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों को सम्बद्ध किया गया, इसका भी मिला जुला ही असर है, एक समय पर कुछ राजीवगाधी अभिनव स्कूल भी कुछ स्थानों पर खोले गये है लेकिन उसको भी ऐसे ही रखा गया, अब कुछ स्थानों पर कुछ स्कूल को पी एम श्री स्कूल स्कूल के रूप में लिया गया है, सरकार की तरफ से इनको खूब संसाधन, बजट दिया जा रहा है बहुत अच्छी बात है । मेरा अनुभव है कि शिक्षा को लेने व देने में समय लगता और शिक्षा में निवेश करने से उसका दीर्घकालीन परिणाम मिलता है न कि तत्काल परिणाम, इसलिए तत्काल कोई योजना बिनां समय और पूरी व्यवस्था दिये बिना लागू नहीं की जानी चाहिए, और यदि लागू कर रहे हैं तो उस पर , पूरा फोकस होना चाहिए। भौतिक संसाधन से लेकर मानवीय संसाधन तक और कम से कम पूरा समय 8- 10 साल दियें जाने उचित होगे, तब आकलन करना चाहिए कि योजना सफल हो रही है या नहीं। अभी केवल और केवल पर्वतीय क्षेत्रों में हर न्याय पंचायत पर एक ऐसा स्कूल हो जो कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12 तक हो।पूरा संसाधन भौतिक व मानवीय पूरा हो कोई भी पद रिक्त न हो ,और सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हो और 8- 10 सालों बाद उसकी इस बात की समीक्षा की जाय की स्कूल ठीक से चल रहा है या नहीं। साथ में इस बात का ध्यान रखा जाय कि स्कूल के शिक्षक से केवल पठन पाठन का ही काम करें । मेरा सरकारो से भी अनुरोध है कि कि शिक्षा में जल्दी जल्दी कार्य योजना में परिवर्तन न किया जाय, जो भी योजना बने हर सरकार उस पर ध्यान देते हुए आगे बढाये , हम केवल अनुरोध ही कर सकते हैं निर्णय तो नीति निर्धारण करने वालों व चुनी हुई सरकार को ही लेना है। मैं समझता हूँ यह हर छोटे बडे कामो को आरम्भ करने से पूर्व अवश्य सोचना उचित ही होगा। चरैवेति चरैवेति।

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