उत्तराखंड की स्थायी राजधानी (Permanent Capital of uttrakhand)

       


कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार  की जननी है, जब कभी  मावव  जाति को किसी चीज  की आवश्यकता हुई  ,तो उसका  आविष्कार  होता  चला गया है,  और अभी  भी आविष्कार  हो ही रहे हैं  और मैं  समझता हूँ कि  आगे   भी  तब तक होते  रहेंगे  ,जब तक इस भूमि  पर मानव जाति  रहेगी।  आविष्कार   विकास   का संकेत  है  कहे,  तो इसमें  कोई  गलत नहीं है।  एक समय था,  जब पर्वतीय  क्षेत्र  के लोग  छोटे - बड़े  कार्यो के लिए  लखनऊ  की  दौड़  लगाते  ,  निसन्देह  जाना ही पड़ता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजधानी  लखनऊ थी और यह  पर्वतीय क्षेत्र , उत्तराखंड  भी ,उत्तर प्रदेश   में  सम्मिलित था। इस पर भी उत्तराखंड  की विषम  विशेष भौगोलिक  बनावट  जो कि दैनिक  कार्यों  के सम्पादन  में  सबसे  बड़ी  रुकावट  थी, यह सबसे  बड़ी  परेशानी भी  थी। उत्तराखंड  को अलग प्रदेश  बनाने  को लेकर समय - समय  माँग होती  रही थी। सन 1994 मे यह मांग  चरम पर पहुंच गयी, 24 अप्रैल  1994 को उत्तराखंड  संयुक्त  संघर्ष  मोर्चा  ने दिल्ली  में  विशाल  रैली  आयोजित की ,तत्कालीन मुख्यमंत्री  मुलायम सिंह यादव  के नेतृत्व में  सपा-बसपा  सरकार ने  नगर  विकास मंत्री  रमाशंकर  कौशिक  की अध्यक्षता में  मंत्रीमण्डलीय  उपसमिति गठित की गई  जिसनें  जून  में  अपनी  रिपोर्ट  सरकार  को सौंपी ।2अगस्त  को उत्तराखंड  कांति दल के संरक्षक  इन्द्रमणी बडोनी के नेतृत्व में  7 लोग आमरण  अनशन पर बैठे, 8 अगस्त में  ही   तत्कालीन  मुख्यमंत्री  मुलायम सिंह यादव  द्वारा  पिछडे वर्ग  के छात्रों  के लिए  शिक्षण संस्थाओं  में  लागू  किए गए 27% प्रतिशत  आरक्षण का विरोध  कर रहे  अनशनकारीयो पर  अनशन  स्थल पौड़ी  में  पुलिस  द्वारा  लाठी चार्ज  किया गया, और धीरे-धीरे आन्दोलन  और तीव्र  होता  चला गया। वैसे  तो यह  आन्दोलन  सम्पूर्ण  उत्तराखंड में   हुआ    पर   कई  जगहों  पर  यह  आदोलन ने उग्र   रूप  धारण किया , जिसमें  खटीमा पौड़ी, मसूरी, देहरादून, नैनीताल, हल्द्वानी, ऊखीमठ, श्रीनगर  आदि  प्रमुख  स्थानो पर   प्रमुखता  से किया गया है।  और इस आन्दोलन  में  सभी  वर्गो  के लोगों  व सरकारी  गैर-सरकारी  सभी  ने भाग लिया  है।  परिणाम स्वरूप  9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड  का गठन  हो गया  और  प्रदेश  के पहले  अंतरिम  सरकार   के  मुख्यमंत्री  श्री  नित्यानन्द  स्वामी  ने पद एवं  गोपनीयता  की शपथ  ली ।   30  अक्टूबर  2001 को श्री  भगतसिंह  कोशियारी दूसरे  अंतरिम  मुख्य मंत्री  बने। 14 फरवरी 2002 को विधानसभा  के चुनाव  हुए  जिसमें  कांग्रेस  विधायक दल के नेता  नारायण दत्त तिवारी  मुख्य मंत्री  बने। अब मुख्य  बात यह है  कि पर्वतीय  क्षेत्र  की राजधानी  पर्वतीय  क्षेत्रों  में  होती तो अधिक     उपयोगी  होतां, उत्तराखंड  बनाये  जाने  की  मूल भावना   का भी सामना  होता  परन्तु  25 साल हो गये  हैं राजधानी  का विषय जस का तस बना हुआ   है,   जिसे  कि कतई  उचित  नहीं  कहा  जा सकता है, कई सरकारें  आयी और चली गयी  लेकिन  किसी  ने भी इस दिशा  में  कोई  दूरदर्शी  निर्णय  नहीं  लिया,  प्रजातंत्र  में   जनभावनाओ  का सम्मान  करना  किसी  भी सरकार  का प्रथम  कार्य  होना चाहिए,   ऐसा  मैं  और अधिसंख्य  लोग  मानते हैं।  किसी  भी निर्णय  को लेने  में  उसके  दूरदर्शी  परिणामों  को  देखा जाना चाहिए,  जिससे  उसके विकास  को  गति  मिल सके। ऐसे  ही  गैरसैैंण या उत्तराखंड  की   स्थायी  राजधानी   को बनाये  जाने  को लेकर   किया  जाना उचित होता, लेकिन  किसी    सरकार  ने  निर्णय  नहीं  किया,  अब तक ,  अब  उम्मीद  करते हैं कि  आने वाले  समय में   कोई  न  कोई  सरकार  इस विषय  पर अवश्य  उत्तराखंड  की जनभावनाओ  के अनुरूप  निर्णय  लेकर  उत्तराखंड  के सम्पूर्ण  विकास  की बात करे।  राजधानी   महत्वपूर्ण  विषय  है  । छोटे  से राज्य  के लिए   दो- दो  राजधानी   देहरादून  व गैरसैण   रखना  भी भारी  भरकम  बजट  रखना  भी चुनौती पूर्ण    होगा,   परन्तु  इस पर भी  निर्णय  तो सरकार  को ही लेना  होगा । बहुत  लम्बे  समय तक राजधानी  राजधानी  के मुद्दे  को लटकाना उचित  नहीं  होगा, । चरैवेति चरैवेति। 

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