सिद्धसौड बड़मा (रुद्रप्रयाग )शिक्षा का केंद्र (center of education, siddhsour badma)


      उत्तराखंड  प्रदेश  की बनावट  को देखा  जाय तो   हरिद्धार, ऊधमसिंह नगर  का कुछ  हिस्सा नैनीताल के कुछ  हिस्से,  चम्पावत  का टनकपुर  वाले  हिस्से  व   देहरादून  के कुछ हिस्से  को छोड़कर  सभी   पहाड़  ही  पहाड़  लगता है ,  पहाड़  भी ऐसा  कि एक इलाके  में  जाओ  तो दूसरे इलाके  से  वह दूर हो जाता है,  टिहरी की बात मै करूँ(टिहरी  मे नियुक्ति अवधि में)  तो  घनसाली   में  जाकर यही  लगता है कि केवल घनसाली  बाजार  वाला   क्षेत्र  ही  टिहरी का  है,  लेकिन  आगे जाओ तो घुत्तु भिलंग   जाते   हुए एक बहुत  आबादी  वाला  क्षेत्र  मिलता है,  दूसरा  अखोडी  वाली रोड पर निकलो,  तो वहां  भी  एक बहुत  आवादी  वाला  क्षेत्र    मिलता है  जो आगे  चलकर  चिरविटिया  वाली रोड मे मिलता,है, इधर से बूडाकेदार  वाली  रोड  से निकलो तो  वहां  भी एक बहुत आवादी वाला क्षेत्र मिलता है  और करीब करीब  सभी  पर्वतीय  क्षेत्रों में  ऐसी  ही स्थिति है  । सेवा   मे रहते  हुये  सभी  जिलों  को मैंने  देखा है, चम्पावत, टिहरी, पौड़ी, चमोली  ,रूदप्रयाग, देहरादून  में  तो सरकारी  सेवा   के  दौरान  नियुक्ति  होने  के फलस्वरूप  देखा  है,  और अन्य  जनपदों  में  शासकीय  सेवा  के दौरान  जाना पड़ा तब देखा है, पर्वतीय  जिलों  का  तो जन जीवन  कुछ कठिन  है   ही,    उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों का जनजीवन बेहद अनोखा और प्रकृति से जुड़ा हुआ भी  है!  यहां के लोग मुख्यतः कृषि, पशुपालन और  बहुत कम बागवानी पर निर्भर हैं। यदि  शासकीय  सेवा की बात करे तो  अध्यापक, फौज में  सबसे  अधिक  लोग  है   अन्य  सेवाओं  में  भी  है पर अपेक्षाकृत  कम हैं ,चारधाम  यात्रा के  समय  पर्यटन  में  भी काफी  लोग  लगे रहते हैं  खेती के लिए पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ियां बनाई जाती हैं, जहां गेहूं, मंडुआ, धान, झंगोरा जैसी फसलें उगाई जाती हैं, किसी  इलाके  में  माल्टा  अधिक  होता है,  लकड़ी, पत्थर और मिट्टी से बने घर, जो ठंड में गर्म और गर्मियों में ठंडे रहते हैं। अब अधिकतर  लोग  सीमेंट  से युक्त  घर बना रहे हैं । लोग सामूहिक परिवारों में रहते हैं, जहां सहयोग और एकता का भाव मजबूत है। लेकिन  आधुनिकीकरण  के दौर में  यह भी धीरे-धीरे    परिवार की   सामूहिकता  भी कम हो रही है  ,या यू कहे  कि समाप्त  हो गयी है,  ढोल -दमाऊं, बीन-बशुली ,  ढोलक, आदि जैसे वाद्ययंत्रों के साथ लोकगीत, नृत्य और । न्यौली गीत (विरह गीत) यहां की सांस्कृतिक पहचान हैं  पृथक उत्तराखंड राज्य के लिए *इन्द्रमणि बडोनी* (पर्वतीय गांधी) जैसे नेताओं का संघर्ष यहां की प्रेरणा है,  जिम  कॉर्बेट, मसूरी, नैनीताल जैसे हिल स्टेशनों से रोजगार बढ़ा है, पर पलायन भी एक चुनौती है संक्षेप  में  उत्तराखंड  की पर्वतीय जीवनशैली सादगी, प्रकृति और संस्कृति का मेल है। मेरा  बचपन  और स्कूली  शिक्षा  भी पर्वतीय  क्षेत्रों में  हुई ।  उस समय  सिद्धसौड  में  एक  जूनियर  हाई स्कूल था  जिसमें  की एक छात्रावास भी था  दूर  दूर  से   इस जूनियर  हाई स्कूल  में  बच्चे  पढने  आते थे  ऐसा सुना  था हमारे   समय तो यह  हाई स्कूल  था जो  कि उसी  समय इण्टरमीडिएट  के रूप में  उच्चीकृत  हुआ  था  , और केवल  साहित्यिक  वर्ग की मान्यता थी,  और तीनों पट्टी  बडमा, सिलगढ व बागर  के अधिकतर   पढने वाले   बच्चे उसी  इण्टर कालेज में  दूर-दूर  से पढने   आते  थे, मै स्वयं  भी  3  किमी  दूर जाता  था । उस समय शिक्षा के क्षेत्र में  इसका  एक नाम था , यहाँ  से   जिन्होंने  शिक्षा  प्राप्त की है,  बहुत  बडे पैमाने  पर शिक्षा  के क्षेत्र में  कार्यरत  हैं , या  सेवा करते  हुए  सेवानिवृत्ति  हो  गये हैं  ,  फौज  में भी काफी   लोग   देश  सेवा के लिए  निकले  हैं, उस समय  80 के दशक में  यदि  किसी को सिद्धसौड  जाना  था तो या तो रामपुर  (तिलवाडा  से 2किमी आगे) में  उतरना और फिर करीब-करीब  4 से 5 किमी  की चढ़ाई  चढकर   रा0इ0का0 सिद्धसौड  पहुंचना  होता था या फिर अगस्त्यमुनि  से जाना  होता था।  आज तो कालेज के पास रोड पहुँच गयी है।  आज भी   इस कालेज  में  पढने  वालों  की अच्छी  संख्या  है  मेरा   मानना है कि  कि यदि  किसी  इलाके का विकास  करना है  तो सबसे  पहले  वहाँ रोड  जो कि  कभी   बाधित न हो    जानी चाहिए,  तो सारी व्यवस्थाओं  को करने  में  आसानी हो  जाती है  । उस समय को यादकर  लगता है कि  तब बहुत  कठिन  दौर में  हमारी  उम्र  के लोगों  ने पढ़ा है और हमसे  पहले  वालों  ने तो और भी कठिनाई  देखी  होगी , मेरा अनुभव  यह  भी कहता है कि  कठिनाइयों  से जीवन  जीने  में  सफलता  भी आसान  होती  है इसलिए  कि वह उस कठिनाई का  वह  मतबल  भी समझता है  और  ठीक से मेहनत भी  करता है,  खैर  हर  नयी  पीढ़ी को अधिक  सुविधा  मिलती  जायेगी  यही विकास  समझ में  आता है। सरकार व जन प्रतिनिधियों  से भी अनुरोध  है कि इस बडे भू भाग  में  कोई  राज्य  स्तर की संस्था  या राष्ट्रीय  स्तरीय  कोई  संस्थान  खोले,  जिससे  इस  क्षेत्र  का  पलायन  भी रूके  और   क्षेत्र  का विकास  भी  हो सके। पहले थाती दिगधार (बडमा ) नामक स्थान में  सैनिक  स्कूल  खोलने की बातें  हो रही थी,  धीरे-धीरे  वह समाप्त  हो गयी , अब वेटनरी  मैडिकल  कालेज की घोषणा  हो रखी है पर अभी तक उसका भी कुछ  पता  नहीं है  कि कब तक आरम्भ  होगा। साथ  में  अपने  जनप्रतिनिधियों   से  भी अपेक्षा  रहेगी कि  वे समय-समय  पर सरकारों  का  इस  ओर ध्यान  आकृष्ट  करते  रहेंगे। चरैवेति  चरैवेति। 

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