वृद्धावस्था( old age)

     


बुजुर्ग  व्यक्ति  घर परिवार  की मुख्य धुरी  होता है यदि  इसे  घर की रीढ़  कहा जाय  तो कुछ  भी गलत नहीं है। लेकिन  आमतौर पर  एक अवस्था  के बाद उनके महत्व की अनदेखी की जाती है, जो कि परिवार  व समाज  के लिए  अच्छा  संकेत  नहीं है। दरअसल  बुजुर्गों  में  बढ़ता   अकेलापन,    उनके  जीवन की  नीरसता,  इस बात का प्रमाण है  कि हम दिनों  दिन  उन्हे  अपनी जिंदगी से अलग  कर रहे हैं, लेकिन  यदि  थोड़ा  सा प्यार  व अपनापन उन्हें  दिया  जाय  तो बदले  में  न  केवल  हमें वे अपना  आशीर्वाद  व दुलार देते हैं,  बल्कि अपने  जीवन  के अनमोल  अनुभव  भी जी खोलकर  बताते हैं,  जो कि आने वाले  समय में  हम सब के लिए  लाभकारी  होते हैं।  आप अपने  आसपास  या अपने  स्वयं  के घरों  में  रह रहे  बुजुर्गों  को देख सकते हैं और अनुभव  कर सकते हैं। कई बार तो मीडिया  में  भी बहुत ही  डरावनी तस्वीर  पढने  व देखने  को मिलती है । ऐसा नहीं  है  यह बात सभी   परिवारों  के बुजुर्गों  पर  ही लागू  होती  है,   परन्तु कुछ  पर तो यह लागू होती ही है।  वृद्धावस्था  मनुष्य के  जीवन  का सच है ,यह अवस्था  हर किसी के  जीवन  में  आती है  हम सभी  को शैशवावस्था, बाल,युवा  और अधेड़ अवस्था  से होते  हुए  वृद्धावस्था  तक पहुुँचना  होता है।   यह  अवस्था  जीवन  का वह समय है  जब हमारा  शरीर  बहुत  कमज़ोर  पड़  जाता है अंगों की  चेतना  शिथिल पड़ जाती है,  दूसरों पर निर्भरता अधिक  हो जाती है,  किसी    समय    तो बुजुर्ग   बिना  सहारे   के  रह  ही  नहीं  सकते हैं,   ऐसे  में  परिवार के सदस्यों  से उपेक्षा  और उपहास  मिले तो जीवन  नरक के समान  प्रतीत होता है। यह समाज  के लिए  एक विचारणीय  प्रश्न है और उस शिक्षा  पर भी जो  ऐसे  नागरिक  तैयार  कर रहा है।   जिस प्रकार  से हम अपने  बच्चों   को  बहुत ही प्यार  से पाल पोस कर बड़ा करते हैं, उनकी  हर जरूरत  पूरी करते हैं  ,उनकी  गलतियों  को अनदेखा  करते हैं  और  वह  यह भी सोचता है  कि जब  उसके  बच्चे  बड़े  हो जायेगें  और वह बृद्ध  होगा  तो उसके  बच्चे  भी इसी  तरह उसका ध्यान रखेंगे  ठीक  उसी  प्रकार  से  हमारे बुजुर्गों  ने भी यही काम किया  होगा  और यदि  हम उनको  उपेक्षित  रखें   तो इसे कतई ठीक  नहीं  कहा जा सकता है, ।देखा जाए तो  जीवन  के इस पड़ाव  में  मनुष्य  शारीरिक  आपूर्ति  बहुत  कम होती है , बृद्ध व्यक्ति  न तो बहुत  ज्यादा  खाते हैं  और न ही उनके   शौक युवाओं की  तरह होते हैं  बस उनकी  एक ही चाहत होती है  उनके  बच्चे, परिवार  वाले  , उनके  जान पहचान  वाले  उनकी उपेक्षा  न करें, उनका  अनादर न करें । अखबार, व आकड़े  कहते हैं  कि बुजुर्ग  व्यक्ति  अपने  परिवार  में  सबसे अधिक  उपेक्षा  का दंश  झेल रहा  होता है। वृद्धावस्था  शारीरिक   दृष्टि से  तो शरीर  के ढलान की अवस्था है,  लेकिन  यदि व्यक्ति  में   भावनात्मक  परिपक्वता  व मानसिक बल है,  कुछ  कर गुजरने की चाहत है  तो  वृध्दावस्था  जीवन के लिए  वरदान  भी बन सकता है। यह अवस्था  ऐसी  है   जिसमें  व्यक्ति  के उपर (अपवाद  को छोड़कर)  जिम्मेदारीयो का बोझ  कम हो जाता है यानी  बच्चे  बड़े  हो जाते हैं, सक्षम हो जाते हैं, सामाजिक  तौर पर भी कार्यस्थलो  से भो उसको  मुक्त  किया  जा चुका  होता है ,यह भी कह सकते हैं कि   इस अवस्था  में  उसे  सेवानिवृत्तजा चुकी  होती  है। जीवन  के इस समय  में  व्यक्ति  के पास अपने  लिए  काफी  समय होता है। (यदि  वह कुछ करना  चाहता है) इसलिए  वृद्धावस्था  को यदि  उपयोगी  बनाना है तो अपने  मानसिक  बल को बढ़ना चाहिए, अपने  अंदर  मनोबल  व संकल्प  शक्ति  को विकसित  करना चाहिए ,क्योंकि इसी शक्ति  के सहारे  जीवन के किसी  भी अवस्था  में आत्मनिर्भर  रह सकता है  और अन्य को भी आत्मनिर्भर  बना  सकता है। हम सभी  को अपने अपने  घरों  के  बुजुर्गों का विशेष  ध्यान  रखना चाहिए।   । चरैवति चरैवेति। 

टिप्पणियाँ

  1. प्रणाम सर,बहुत सुंदर आलेख।परिवार में वृद्ध व्यक्ति का हर हाल में सम्मान होना चाहिए।उसकी जरूरतों का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि उसका पूरा जीवन अपने परिवार को बनाने में व्यतीत हो गया।

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  2. बहुत ही सही विचार है आपके, धन्यवाद

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