बोर्ड परीक्षा Board Exam

 


वैसे  तो जीवन में  हर समय  कोई न कोई  परीक्षा  लगी रहती है, आजकल विभिन्न  बोर्डो की  वार्षिक  परीक्षाये आयोजित  हो रही  हैं  और साल में  शिक्षक  ने क्या  पढ़या  और छात्रों  ने क्या  पढा है इन परीक्षा के बाद दोनों  का मूल्यांकन  होगा या  सभी  का   मूल्यांकन  किया जा सकता है । मै अपने  1980-81 दौर   के  सालों   को याद करता हूँ  तो आजकल की परीक्षा  और तबकी परीक्षा आयोजन/व्यवस्थाओ में  काफी  भिन्नता  दिखाई देती  है । उस समय परीक्षा  मे कितना  तनाव     होता था   (आज भी  प्रतिस्पर्धात्मक  तनाव अधिक है),  विशेषकर  माता  पिता  भी बहुत ही  उत्साही    रहते थे,  उस जमाने  में 1980-81   के आस पास  स्कूल  में  परीक्षा  का एक अलग  प्रकार  का उत्साह  ही होता  था, संसाधनों का काफी अभाव  था, स्कूल  दूर  दूर  थै लेकिन  उत्साह  गजब का होता था,  परीक्षा में  तो  केवल  बच्चे  को बैठना होता था लेकिन  उसके  सहयोग  के लिए  अभिभावक  व रिशतेदार भी  सुविधाओ को देने  के लिए तैयार  रहते थे, यहाँ  तक की परीक्षार्थी  का समूह  गुरुजनों  की देख रेख में  स्कूल  के नजदीक  ही कमरा  किया  जाता है, जिससे  बच्चे  अच्छे से पढ सकें,   पूरा कीचन भी साथ-साथ  जाता था, रसोई  बनाने के लिए  भी किसी  को साथ ले जाते थे,  या  एक महीने  के लिए  स्कूल  के पास खुले हुए  होटल में  व्यवस्था  की जाती थी  । कुछ  विशेष  स्कूलो की विशेष  पहचान पढाई  के लिए  भी  होती थी ,और कुछ  की पहचान अन्य  विशेष   क्षेत्रों  में  भी होती  थी ,उस समय का भी अलग ही आनंद  होता था। पढने में   होशियार  बच्चों  से बच्चे   आरम्भ  से ही दोस्ती  करते  थे शायद इसलिये कि बोर्ड  परीक्षा में  मेरी भी कुछ सहायता कर दे, कक्षा  10 पास करना  उर दौर  में  बहुत  ही कठिन  समझा जाता है  कुल बोर्ड परीक्षा   का ही  परीक्षा परिणाम  ही 30  से 40 प्रतिशत तक ही  होता  था जिसमें कुछ  स्कूलो का परीक्षा परिणाम  30 से भी नीचे  रहता  यहाँ तक कि कुछ  का परीक्षा परिणाम  10 प्रतिशत  या इससे  भी नीचे रहता  था।  यदि  कोई  छात्र  पहली  बार  में  पास हो जाता  तो उसकी पूरे गाँव  में  खूब तारीफ़  होती, 1st division  तो बहुत  ही मुश्किल  से एक आद को ही(पूरे इलाके में) मिल पाती है  थी।  तब परीक्षा  भी दोनों  पारियों  में 7am से 10am व  3 pmसे 6 pmमे होता  था, बाद में  साय की पाली 2 pmसे 5 pm होने लगी। 1980 की बात है  कि  पेपर हो गये थे ,बाद मे पता  चला कि  किसी  जिले में paper out हो गये  और लगभग  सभी  paper दुबारा  छात्रों  को देने पड़े, मेरा अनुभव  है कि  परीक्षा  देने  से पहले    जो एक बेचैनी  होती है  ,  वह  परीक्षा के बाद वह बेचैनी  कुछ  समय  तक शान्त हो जाती है   फिर परिणाम   आने के नजदीक फिर बढ़  जाती है  खैर इसमें  सभी पाठकों  का अपना  अलग अलग अनुभव होगा  , परीक्षा  समाप्त  होने  के बाद  सभी  परिणाम  को जानने की जल्दी  होती है, उस  समय  में  परीक्षा  फल भी जुलाय के आखिरी  में  या अगस्त  तक जारी  होता  था, परिणाम  भी समाचार पत्रों  में  निकलता था,इलाके  के कुछ  लड़के  result  वाले paper को लेने के लिए  2 ,3 दिन पहले  हरिद्वार ऋषिकेश  निकल जाते थे, दूसरे या तीसर  दिन तक अखबार  गावों  या नजदीकी  बाजारों  में  मिलता  था, देखने  के लिए रेट निश्चित  होता था,  प्रथम श्रेणी के लिए 5०० द्वीतीय के लिए 3०० पास/तृतीय श्रेणी के लिए 2००रूपये निश्चित होता था, उस समय के लिए  यह राशि  किसी  के लिए  भी कम न थी ,जब तक परिणाम  न देखा  तब तक पूरे  पारिवारिक  सदस्य  भी बेचैन  रहते,  और गाँव वाले  भी  उत्सुकता  से टक-टकी लगायें  रहते।  उत्तीर्ण   होने पर  अखबार  वाले को  तत्काल निर्धारित  रकम दे दी  जाती  थी । किसी  भी परीक्षा  में  उत्तीर्ण होना एक कला  भी होती है ,परीक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति के ज्ञान, कौशल और समझ का मूल्यांकन किया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण तरीका है जिससे हम अपनी शिक्षा और प्रशिक्षण की गुणवत्ता का आकलन कर सकते हैं और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं। इसलिए  किसी  भी परीक्षा में  बैठने  से पूर्व  अपना  मूल्यांकन  व यदि  कमी  है तो पूर्ण  तैयारी के साथ  जाना चाहिए ,अपने  कमजोर  विन्दुओं  पर विशेष जोर  दिया जाना  उचित ही होगा,  परीक्षा से हमें प्रतिस्पर्धा का अनुभव होता है, जो हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है  । परीक्षा एक बहुत  ही  आवश्यक प्रक्रिया है जो हमें अपने ज्ञान, कौशल और समझ का मूल्यांकन करने में मदद करती है। परीक्षा के लिए नियमित अध्ययन, प्रश्नों का अभ्यास, समय प्रबंधन और आत्म-विश्वास बनाए रखना आवश्यक है। इसलिए हर समय किसी  न किसी  परीक्षा देने के लिए तैयार  रहना  उचित ही  होगा।  चरैवेति चरैवेति। 

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