सुख की चाहत में, व मोह-माया के जाल में फॅस ही जाता है मनुष्य

       


 दैवी ह्मेषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव प्रपद्यन्ते  मायामेतां तरन्ति ते।।             (श्रीमदभगवदगीता)

  भगवान  श्रीकृष्ण  अर्जुन  से कहते हैं कि यह  अलौकिक, अति अद्भुत  त्रिगुणमयी मेरी  माया बड़ी  दुस्तर  है, परन्तु  जो पुरुष  केवल  मुझको  ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं  अर्थात  संसार से तर जाते हैं। भगवान की माया  बड़ी  विचित्र है।बड़े बड़े  ज्ञानियो,महात्माओ,भिक्षुओं, सिद्धो को भी नहीं  छोड़ती है। इसे जान पाना ,समझ पाना  संभव नहीं है, यह भांति भांति  से मनुष्य  को नाच नचाती है। व्यक्ति  के अहंकार  को चूर चूर करके  रख देती है। उसे  यह एहसास  दिला देती कि भगवान  की माया  क्या है ? स्वामी विवेकानंद जी  ने अपने  एक पत्र में  संसार  के बारे में  लिखा  था ' यह जगत मानो फूल मालाओ  से ढँका  हुआ  एक सडा  हुआ  मुरदा है। यदि  संभव हो तो  इसका  स्पर्श  तक न करना। सदा मेरा शुभाशीर्वाद जानना । ' जिस तरह सुन्दर  फूलों से  ढका हुआ  मुर्दा  शरीर  ऊपर से  देखने  पर तो सुन्दर  दिखाई देता है, लेकिन  उसके नजदीक जाने  पर उससे  असहनीय  दुर्गंध  आती है, जिसे झेलना  मुश्किल  होता है। ठीक इसी तरह यह संसार  है। ज्ञानी जन इस संसार को माया इसीलिए  कहते हैं, क्योंकि  यहाँ पर  कुछ भी स्थिर  नहीं है। निरंतर  हर चीज  परिवर्तित  हो रही है।  जो आज है, वह कल नहीं रहेगा, जो कल रहेगा वह आज नहीं है। इसलिए  इस संसार  में  प्राप्त करने योग्य  कुछ  भी नहीं है। जो कुछ  भी चीजें  इस संसार  मे हमारे  मन को आकर्षित  करती है, वे भले  ही आज हमारे  लिए  महत्वपूर्ण  हो, लेकिन कल नहीं  रहेंगी। इस संसार में  हर चीज  पानी के बुलबुले  के समान पैदा  होती है  और उसी तरह विलीन हो जाती है। यहां लोग  एक दिन  जन्म  लेते हैं  और एक दिन  मर जाते हैं, लेकिन फ़िर भी  इस संसार  के माया मोह के मायाजाल  में  लिप्त  रहते हैं  कि उन्हें  जीवन की कुछ  सुध बुध ही नहीं  रहती। यह संसार  सत्य  भी है  और मिथ्या  भी।सत्य  इस रूप में  कि इस संसार के कण-कण  में  परमात्मा  का निवास  है या यों कहें  कि इस  संसार  के हर प्राणी  के अंदर  जीवात्मा  रूप  में  परमात्मा का अंश विद्यमान है। जो उन्हे  देख पाता,समझ पाता है अनुभव  कर पाता है, वह इस  संसार के मोह माया  में नहीं  फंसता ,परमात्मा तक पहुँच  जाता है, ब्रह्म  का साक्षात्कार  कर लेता है, लेकिन जो संसार  के इस दिव्य  रूप को नहीं  जानता, वह केवल  मृगमरीचिका  की तरह इसमे  भटकता  रहता है। इस संसार  में  व्यक्ति  को  सर्वाधिक  आकर्षित  करती है,   वह है  सुख की चाह।इस सुख को पाने के लिए  वह तरह-तरह कै प्रलोभनो में  फँसता  है,लेकिन  उसे  वास्तविक  सुख नहीं  मिल पाता है, वह सुख की  चाहत में  केवल भ्रमित  होता  रहता है, जैसे  रेगिस्तान  में  पानी का आभास  तो होता है, लेकिन पानी  होता नहीं है, केवल पानी होने का भ्रम  होता है, ठीक इसी प्रकार  संसार  में  व्यक्ति  को विभिन्न चीजों  में  इच्छाओ की पूर्ति  में केवल  सुख का आभास  होता है, वास्तविक सुख मिलता  नहीं  और माया रुपी  यह संसार  व्यक्ति को केवल  भ्रमित करता  रहता है, और वह मोह आसक्ति  के दलदल  में धंसता  जाता है, इससे निकल नही पाता। चरैवेति चरैवेति। 

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