ओज शक्ति ही शरीर से निकलकर आश्चर्यजनक कार्य करती है ।

  



यदि  आप / हम केवल अच्छी  अच्छी  बातें  या भाषण करें  तो,ऐसा करने  मात्र से हम अच्छे  नहीं  हो सकते हैं, अपितु  उसको अपने  तौर तरीकों,  व अपने  आचरणों  में  भी लाना  होगा। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि " एक व्यक्ति  बड़ी  सुन्दर भाषा में  सुन्दर  भाव व्यक्त करता है,परन्तु लोग  आकृष्ट  नहीं  होते  और  वही  दूसरा व्यक्ति  न सुन्दर  भाषा  बोल सकता है, न सुन्दर  ढंग से  अपने  भाव व्यक्त कर सकता है, परन्तु  फिर  भी लोग  उसकी  बातों  से मंत्र मुग्ध  हो जाते हैं।  ऐसा  क्यों  ? यह ओज शक्ति  ही शरीर  से निकलकर  ऐसा  अदभुत कार्य  करती है। इस ओज शक्ति  से युक्त  मानव  जो कुछ  कार्य  करते हैं, उसी में   महाशक्ति का विकास  देखा जाता है। ब्रह्मचर्य का पालन  करने  वाले  स्त्री  पुरुष  ही  इस ओजधातु को मस्तिष्क में  संचित  करते हैं। इसलिए  ब्रह्मचर्य  सर्वश्रेष्ठ  माना गया है। मनुष्य  सहज ही अनुभव  करता है,  कि काम को प्रश्रय देने  पर सारा धर्म  भाव,चरित्र बल,और मानसिक  तेज जाता रहता है, इसी कारण  देखोगे, संसार में  जिन जिन सम्प्रदायो में  बड़े  बड़े  धर्मवीर पैदा हुए, उन सभी  सम्प्रदायो  ने ब्रह्मचर्य पर विशेष  जोर दिया है। "  पाप कर्म  मनुष्य  को पतन की ओर  ले जाते हैं, स्वामी  विवेकानंद  ने इस बात को इशारा करते हुए कहा था कि " नीतिपरायण तथा  साहसी  बनो, अन्तकरण पूर्णतया  शुद्ध रहना चाहिए।  पूर्ण  नीतिपरायण तथा  साहसी बनो  अपने  प्राणों  के लिए कभी  न डरो। धार्मिक  मत मतान्तर  को लेकर व्यर्थ  माथापच्ची न करना। कायर लोग  ही पापचरण करते हैं, वीरपुरूष कभी  भी पापनुष्ठान नहीं  करते, यहाँ तक कि कभी  वे अपने  मन में  भी पापचिन्ता का उदय नहीं  होने देते  । " नैतिक नियमों  का पालन करने  की वे सलाह  देते  हुए कहते हैं " नीति संगत और नीति  विरूद्ध  की यही  एक मात्र  व्याख्या  हो सकती है  कि जो स्वार्थपरक है वह नीति   विरूद्ध  है और जो निस्वार्थपरक है वह नीति संगत है "। दूसरों  को कष्ट  देकर सुखी रहना  पाशविकता  है स्वामी  विवेकानंद  ने कहा था कि " उपयोगितावाद मनुष्य  के नैतिक  सम्बन्धों  की व्याख्या  नहीं कर सकता है ,क्योंकि  पहली  बात तो यह है कि  उपयोगिता  के आधार पर  हम किसी  भी नैतिक  नियम पर नहीं  पहुँच  सकते हैं। उपयोगिता  हमसे  असीम अतीन्द्रियता  गंतव्य स्थल के प्रति  संघर्ष  का त्याग  चाहते  हैं  क्योंकि  अतीन्द्रियता अव्यवहारिक  है निरर्थक  है । ' पर साथ ही वे यह भी कहते हैं कि  नैतिक  नियमों का पालन करो, समाज का कल्याण करो ।आखिर हम क्यों  किसी का कल्याण करे  ? भलाई करने की  बात तो गौण है,प्रधान  तो एक आदर्श है  । नीति शास्त्र स्वयं  सांध्य नहीं है, प्रत्युत्तर  साध्य को पाने का साधन है।  यदि  उद्देश्य  नहीं  है तो हम  क्यों  नैतिक  बने ? हम क्यों  दूसरों  की भलाई  करें  ? क्यों  हम लोगों  को सताए नहीं  ? अगर आनन्द  ही मानव  जीवन  का  चरम उद्देश्य है, तो  क्यों  न मै दूसरों  को कष्ट पहुँचाकर  भी  स्वयं  सुखी   रहूँ  ? ऐसा करने  से मुझे  रोकता  कौन है  ? दूसरी  बात यह है  कि उपयोगिता  का आधार  अत्यंत  संकीर्ण  है। उपयोगितावादी नियम समाज  की वर्तमान  स्थिति  में  काम कर सकता है।  इसके  आगे  इसकी कोई  उपयोगिता  नहीं  रह जाती, किन्तु  धर्म  तथा  अध्यात्मिकता पर आधारित  नीति शास्र  का क्षेत्र  असीम मनुष्य  है। वह व्यक्ति  को लेता है,पर  उसके  सम्बन्ध  असीम है। वह समाज  को भी लेता  है, क्योंकि  समाज  व्यक्तियो के समूह  का ही नाम है।  "  नीति  शास्र  का पूरा  निचोड़  त्याग  पर आधारित  है। चरैवेति चरैवेति। 

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