सामान्य -14

 


कांग्रेस  की कार्य  कारिणी  को 1929 मे हुई  लाहौर  कांग्रेस  में  यह अधिकार  दिया गया  था कि वह देश में  सविनय अवज्ञा  आदोलन  छेडे।इस आदोलन  में  कर न अदा करना  भी शामिल था।इसने  विधानसभा  के सदस्यों  से विधायक  पद से इस्तीफा  देने का भी आह्वान  किया  गया था।1930 की मध्य  फरवरी  में  साबरमती आश्रम में  कांग्रेस  कार्यकारिणी  समिति की बैठक  हुई  जिसमें  गांधी जी को इस बात का अधिकार दिया गया  कि वे अपनी  इच्छा  से जब और जिस जगह से चाहे, सविनय अवज्ञा आन्दोलन  का शुभारम्भ  कर सकते हैं। गाँधी जी  जन आंदोलनों कै माने हुए  विशेषज्ञ थे,वे गम्भीरता  से जन संघर्ष  छेड़ने  के लिए  प्रभावी  तरीका तलाश कर रहे थे। हर प्रकार की  न्यूनतम  मांगो  ़वाली  31 जनवरी  की उनकी  चेतावनी  भरी माँग  को ,जिसमें  न्युनतम  मांगो  का 11-सूत्रीय माँग पत्र पेश किया गया था, लार्ड इरविन  ने अनदेखा  कर दिया  था।इसलिए  अब सिर्फ़  एक ही रास्ता  बचा था ,सविनय अवज्ञा आन्दोलन  का। फरवरी  के अत में  जैसे  जैसे  गाँधी जी ने नमक  की बात करनी  शुरू  की,सत्याग्रह का सूत्र स्पष्ट  होने लगा,"पानी से पृथक  नमक की कोई  चीज़ नहीं है, जिस पर कर लगाकर राज्य  करोड़ों  को भूख  से मार सकती है। बीमार, असहाय  और विकलांगो  को पीड़ित कर सकती है। इसलिए यह  कर अत्यंन्त  अमानवीय  है  विवेकपूर्ण  है जिसका उपयोग  मानवता के  विरूद्ध  किया  जाता है।"और 2 मार्च को  गांधी जी  ने वायसराय  को अपना  पत्र लिखा  जिसमें  उन्होंने  विस्तार से  स्पष्ट  किया  कि क्यों वै ब्रिटिश राज को अभिशाप  मानते हैं, " लगातार  शोषण करने  वाली  व्यवस्था  क़ायम  करके  इसने  असंख्य  दीन हीन लोगों को  दरिद्र  बना  दिया है ।इसके कारण  हमारा  आध्यात्मिक  अधःपतन हुआ है । " इसके बाद  गाँधी जी ने अपनी  भावी कार्ययोजना  की सूचना  दी थी, जैसा कि उनका  विश्वास  था कि हर सत्याग्रही  को करना चाहिए। इसकी योजना  बहुत  समझदारी से बनायी गई,आरम्भ में इसकी घोषणा के समय बहुत कम लोगों  ने इसके महत्व को  समझा था।गाँधी जी को साबरमती आश्रम  के अपने   78 सहयोगीयो के साथ अहमदाबाद  मुख्यालय से  गुजरते हुए  गावों  मे होते हुए  240 मील की यात्रा करनी थी।उनके इस कार्य में सहयोगी के रूप में  सभी क्षेत्रों  और धर्मो के लोग शामिल थे। दांडी में  समुद्र  के किनारे पहुँच कर गांधी जी को  नमक कानून तोड़ना था।गाँधी जी ने अत्यंत  मेहनत से लोगों को अपनी  योजना  समझायी,भविष्य की कार्यवाही  के लिए निर्देश  दिए,लोगों को अहिंसा का महत्व  समझाया  और इस बात के लिए तैयार किया  कि सरकार से उन्हें  किस बात की उम्मीद करनी चाहिए और  किस बात की उम्मीद  नहीं करनी चाहिए।  इस आदोलन से संबंधित कुछ  प्रमुख बातें  इस प्रकार  हैं। 1930 को 6 अप्रैल  के दिन  एक मुट्ठी  नमक हाथ में लेकर  गाँधी जी ने  सिविल नाफरमानी आंदोलन  श्रीगणेश  किया। यह एक ऐसा  आदोलन  था जो राष्ट्रीय  आदोलन के  इतिहास में  आम जनता  की भागीदारी  की दृष्टि  से बेमिसाल था।तमिलनाडु में  तंजौर के समुद्री तट पर चक्रवर्ती  राजगोपालाचारी  ने त्रिचिनापल्ली से वेदारण्यम की नमक यात्रा प्रारंभ की । 14 अप्रैल  को नमक  आदोलन  तोडने के  ज़ुर्म  में  जवाहर लाल नेहरू  को गिरफ्तार  कर लिया गया । खुदाई खिदमतकामगारों  के दल को लोग लालकुर्ती के नाम से भी जानते थे,सिविल नाफरमानी  में  इनकी  भूमिका  काफी  अच्छी  थी । उस जमाने में  उनके  काम की वजह हे जो माहोल बना  था,पेशावर में  जन उभार के पीछे  उनका बडा हाथ था,जिसके कारण  एक सप्ताह  से भी अधिक  समय तक पेशावर  पर आम लोगों  का नियंत्रण  रहा। पेशावर  की घटनाएं  इसलिए  भी महत्वपूर्ण  थी कि गढवाल रेजीमेंट  के सिपाहियों  ने निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने  से इन्कार कर दिया  था। 4 मई को वायसराय  ने आदेश  दिया  कि गाँधी जी  को गिरफ्तार  किया  जाय।गाँधी  जी ने ऐलान किया  था कि"  धरासना नमक  निर्माणशाला" पर अपने पूरे  साथियों के  साथ धावा बोलेगे और इस तरह वे  अपना   नमक  कानून तोडने  का काम जारी रखेंगे।  21 मई को  सरोजनी नायडू (जिनको  अखिल भारतीय  कांग्रेस की  प्रथम  भारतीय महिला  अध्यक्ष  होने का सौभाग्य  प्राप्त  हुआ  था) गाँधी जी के अफ्रीका  संघर्ष  के दिनों  के दोस्त  इमाम साहब तथा गाँधी जी के पुत्र  मणिलाल 2000  कार्यकर्तओं   को अपने  साथ लेकर इनका नेतृत्व  करते हुए  उस घेरे की तरफ  बढे जो धरासना  नमक कारखाने  की रक्षा  के लिए बनाया  गया था। अमरीकी पत्रकार  मिलर ने इसका व्योरा दिया है। उसके व्योरे मे भारतीय  राष्ट्रवाद  की खुशबू  है जिसे कई देशो तक उसने  पहुँचाया  था। चरैवेति  चरैवति। 


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