बच्चों को खुला अवसर देने से उनका बहुआयामी विकास


वैसे तो हर काल खण्ड में   प्रत्येक माता  पिता  को अपने  बच्चों के भविष्य की चिता रही है लेकिन  जब हम अपने  बचपन और आजकल के बच्चों  को देखते हैं तो , आजकल  कुछ  ज्यादा ही चिंता  दिखाई देती है  चाहे  वह पालन पोषण को लेकर हो,या बच्चों के भविष्य को लेकर  हो।जब यह सजगता आवश्यकता से अधिक  होती है  तो इसका  प्रभाव  बच्चों की स्वतंत्रता  को प्रभावित  करने  लगता है, आजकल की भाषा में  इसे पैराशूट  पेरेंटिंग कहा  जा रहा है। पैराशूट  का अभिप्राय  एक ऐसी  छत्रछाया  से है,जोकि सर्वागीण  सुरक्षा  प्रदान करना है ।यहां इस शब्द का प्रयोग  उसके  अभिभावक  से है जो कि अपने  बच्चों को आगे  बढ़ाने के लिए  हर समय  उसके  छोटे  बड़े कार्यो  को या तो स्वयं कर देते हैं  या फिर उनकी  मदद  करते  रहते हैं, ऐसा करने से  बच्चों  में  स्वावलम्बन  की भावना  प्राय समाप्त  सी  हो रही है। इसलिए आजकल इसे  पैराशूट पेरेंटिंग कहा जा सकता है। बदलते दौर में  बच्चों को  सिखाने, उनकी  देखभाल  करने, उनका  मार्गदर्शन  करने  के लिए  बच्चों  के साथ रहना  भी आवश्यक है  लेकिन  बच्चों के हर काम जैसे  स्कूल का होमवर्क/टेस्ट, दोस्तों को चुनना, घूमने जाना,क्या खेले या क्या न खेले, आदि  उनके  सभी  कामो  में  हस्तक्षेप करते हैं और  साथ-साथ  में  ही रहते हैं। यदि आप हमेशा  बच्चों क साथ रहेंगे  और उनको किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता  नहीं  देंगे  तो धीरे-धीरे  उनमें  एक प्रकार की परतंत्रता की भावना  पनप सकती है  जो कि आगे चलकर  उसके  लिए  ठीक नहीं  होगी   और उसका व्यक्तित्व प्रभावित  होगा,  ऐसा   मेरा मानना है  हो सकता है आप पाठकों के भी इस पर अपना  अपना अनुभव होगा । आपके  आस-पास  इसके  कई उदाहरण  मिल सकते हैं, जिनके  वजह से माता पिता  पैराशूट  पैरंट्स  बन जाते हैं  जैसे  जो माता  पिता  अपने बच्चों को  हर  क्षेत्र में आगे बढ़ते  देखना  चाहते हैं, उनके मन में  अपने  बच्चों  की सफलता, असफलता  को लेकर  ज्यादा  भय बना रहता है, इसीलिए  वे उनके साथ  हर समय  बने  रहते हैं। आजकल  के तेजी से बढती  स्पर्धा के युग में  उनके बच्चे कहीं  पीछे  न रहें  या पीछे  न रह जाय इस कारण  वे उनके  पीछे  पड़े रहते हैं। उनको ऐसा  लगता है कि  उनके  ऐसा करने से उनका  बच्चा  सफ़ल हो   जायेगा। ऐसे  अभिभावक, जो यह समझते हैं कि  कि आने  वाला समय उनके  बच्चों  के लिए  अधिक चुनौतियों  से भरा  होगा, और अपने बच्चों की काबिलियत  पर कम विश्वास  होता है  या नहीं होता है, इसीलिए वे परेशान  रहते हैं, इसीलिए वे अपने  बच्चों के  पीछे  लगे रहते हैं, ताकि  उनका  बच्चा  असफल  न होने  पाये । कुछ  अभिभावक  ऐसे  भी होते हैं  जिन्हें  बचपन  में  वह सब न मिला जो वह पाना चाहते थे, लेकिन  किसी कारणवश  उनको  नहीं  मिला, कारण आप सभी  जान सकते हैं कि   क्या  क्या  हो सकते हैं ,  इसलिये  अब वे अपने  बच्चों को देना  चाहते हैं, जो उन्हें  नहीं  मिला। जिन माता पिता  को अपने  बचपन में  उपेक्षा मिली, वो भी अपने  बच्चों को अधिक प्यार, अधिक समय  इस उपेक्षा की क्षतिपूर्ति  करना  चाहते हैं, कभी-कभी  जब दूसरे  अभिभावक को अपने  बच्चों के  साथ  अधिक व्यस्त  देखते हैं  तो  वे भी अपने  बच्चों के कार्य  में  हस्तक्षेप  कर देते हैं।  कई लोगों को यह चिंता  सताती है कि उनके  बच्चों का भविष्य  कैसा  होगा, अपनी इस चिंता  दूर करने के लिए  भी वे बच्चों के कामों  में  सहयोग  करते  रहते हैं। इस प्रकार की पेरेंटिंग  से जहाँ  एक तरफ बच्चे  के अन्दर  आत्मविश्वास  व आत्मनिर्भरता  की भावना  नहीं  पनप  पाती वही  दूसरी तरफ  ऐसे  बच्चे  अपने  किसी  भी कार्य  के लिए  दूसरों पर अपनी  निर्भरता रखते हैं, किसी  भी तरह की परिस्थितियों  का स्वयं  सामना  करने  से झिझकते है, किसी भी चुनौतीयो को आसानी से  स्वीकार  नहीं करते हैं  और न ही स्वतंत्र  निर्णय  ले पाते हैं,यदि सफल हो गये  तो सफलताओं का श्रेय  स्वयं  नहीं  ले पाते हैं। इसलिए  इन सभी  बातों का ध्यान  सभी  माता पिता  को अवश्य  रखना  उचित होगा ,जिससे  बच्चा  आत्मनिर्भरता  की ओर आगे  बढे,  इस विषय  पर मेरे  पूर्व के कई  ब्लॉगो   में  भी काफी  कुछ अनुभव  आधारित  बातें की गयी है, शायद  नयी पीढ़ी के  काम आ जाये क्या पता  ? चरैवेति चरैवति। 


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