प्रकृति भी हमारे लिए पाठशाला है जो हमें बहुत कुछ सिखाती है
आज के ब्लॉग में मैं कुछ उदाहरणों का जिक्र कर रहा हूँ , मुझे लगा कि इससे हम सभी को सीखना चाहिए इसलिए यहाँ उनका उल्लेख कर रहा हूँ। लोग पृथ्वी पर कितना आघात करते हैं ,पर वह न ही रोती - चिल्लाती है। प्राणी जानें अनजाने में ही एक दूसरे का अपकार कर ही डालते हैं। धीर व्यक्ति को चाहिए कि वह न तो अपना धीरज खोए और न किसी पर कोई गुस्सा करे।वायु से यह शिक्षा पायी जा सकती है, कि अनेकों स्थानों पर जाने के बाद भी वह किसी स्थान पर आसक्त नहीं होती है,और किसी का भी कोई गुण दोष नहीं अपनाती है, इसी प्रकार हम सभी को भी न तो किसी का दोष स्वीकार करना चाहिए और न आसक्ति ।जितने चल अचल पदार्थ हैं उनका आश्रय ंस्थान एक ही है वह है आकाश। आकाश को देखकर यह जाना जा सकता है कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड में जितने भी चर अचर जीव हैं और स्थिर अस्थिर पदार्थ हैं उनमें चेतना ब्रह्मरूप में सर्वव्यापी है।इसी तरह जल स्वभाव से ही स्वच्छ,शुद्ध, मधुर और पवित्र है।जल को देखकर यह सीखा जा सकता है कि मनुष्य को अपना स्वभाव हमेशा स्वच्छ,शुद्ध और पवित्र रखना चाहिए। अग्नि तेजस्वी और ज्योतिर्मय होती है और उसके तेज़ को कोई दबा नहीं सकता है, उसके पास संग्रह परिग्रह के लिए कोई पात्र नहीं हैऔर वह सब कुछ भस्म कर डालती है। भले बुरे सभी पदार्थो को भस्म कर डालने पर भी वह किसी वस्तु के दोषों से लिप्त नहीं होती है , इसी तरह मनुष्य को भी तेजस्वी, इन्द्रियों से अपराजित और विषयों से निर्लिप्त रहना ठीक रहेगा। चन्द्रमा की गति तो नहीं जानी जा सकती है, परन्तु काल के प्रभाव से उसकी गति घटती-बढती रहती है वस्तुत वह न तो घटता है और न बढ़ता है वैसे ही मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक, मृत्यु से लेकर पुन जन्म तक जितनी भी अवस्थाएं बदलती है वे सब शरीर की ही अवस्थाएं हैं। आत्मा का उनसे कोई संबंध नहीं है।सूर्य अपनी किरणों से पृथ्वी का जल खींचता है और समय से उसको वर्षा के रूप में समय पर बारिश करता है, वैसे ही योगीपुरूष समय के अनुरूप विषयों का ग्रहण और त्याग करते हैं,किंतु सूर्य की तरह उसमें आसक्त नहीं होते हैं, कबूतर पक्षी सिखाती है कि दानों का लोभ उसे बहेलिए के जाल में उलझा देता है,इसलिए लोभ से बचना श्रेयकर होगा। अजगर से यह सीखा जा सकता है कि हर परिस्थिति में संतुष्ट रहना चाहिए। समुद्र से यह सीखा जा सकता है कि प्राप्ति में न तो प्रफुल्लित होना चाहिए और न ही अप्राप्ति में खिन्न होना चाहिए। पतंगा दीपक पर मोहित उसकी लौ में कूदकर भस्म हो जाता है, वैसे ही इंद्रियों के भोग में मोहित मनुष्य उन्हीं विषयों में निमग्न होकर स्वयं को नष्ट कर देता है। भौंरा छोटे बड़े पुष्पों का सार भाग ग्रहण करता है। मनुष्य को भी छोटे बड़े शास्त्रों से उनका सार ग्रहण कर लेना चाहिए। मधुमक्खी से ये शिक्षा मिलती है कि उसके संचित मधु का उपयोग दूसरे लोग करते हैं, उसी तरह लोभी मनुष्य द्वारा संचित धन का उपयोग दूसरा ही करता है। हांथी काठ की हथिनी के मोह में फंसकर शिकारियों के कैद में पहुँच ज़ाती है इसलिए मोह काष्ठमूर्ति से भी नहीं करना चाहिए। प्रकृति के बहुत से ऐसे उदाहरण हैं जिनसे सीखा जा सकता है । प्रकृति हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण सबक सिखाती है। कुछ प्रमुख बातें ये हैं । प्रकृति सिखाती है कि जीवन में संतुलन बहुत ज़रूरी है। हर चीज़ एक-दूसरे पर निर्भर होती है। पेड़ धीरे-धीरे बढ़ते हैं, लेकिन मजबूत बनते हैं। इससे हमें धैर्य रखना और लगातार प्रयास करना सीखना चाहिए ।ऋतुएँ बदलती रहती हैं। प्रकृति सिखाती है कि बदलाव जीवन का हिस्सा है और उसे अपनाना चाहिए, प्रकृति सरल जीवन जीती है, फिर भी सुंदर और पूर्ण है। यह हमें सादगी में खुश रहना सिखाती है। नदियाँ, पेड़, पशु-पक्षी सभी मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। इससे हमें मिल-जुलकर रहना सीखना चाहिए। सूखा पड़ने के बाद बारिश और पतझड़ के बाद बसंत आता है। यह आशा और नई शुरुआत का संदेश देता है।संक्षेप में, प्रकृति हमे सही ढंग से जीना, सहनशील बनना और दूसरों के साथ सामंजस्य में रहना सिखाती है। यह हम पर निर्भर कि हम इनसे सीखे या नहीं सीखे ,और अपना मूल्यांकन भी कर सकते हैं कि हम कौन गुण और दुर्गणो हे युक्त है कैसे अच्छे गुणों का समावेश हो और कैसे दुर्गुणो का त्याग हो।चरैवेति चरैवेति।
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