कर्म ही मुख्य रूप से भविष्य के लिए उत्तरदायी है ।
कर्म ही एक ऐसा तथ्य है कि जिसकी अनिवार्यता सभी को स्वीकार करनी पड़ती है मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है ,जिस प्रकार वह अनुपयुक्त विचारों एवं आदतों का का गुलाम बन कर अपनी स्थिति दयनीय बनाता है, उसी प्रकार यदि वह चाहे तो अपने विवेक का इस्तेमाल कर,अपनी गतिविधियों को सुधार भी सकता है । छोटा -बड़ा, घटिया-बढिया कैसा भी मनुष्य क्यों न हो,उसे कर्म तो करना ही पड़ता है। जब तक जीवन है कर्म उसके साथ लगे ही रहेंगे, पर ध्यान देने की बात यह है कि वे कर्म ऐसे हो जो शुभ और श्रेष्ठ समझें जाए।हमारे और दूसरों के लिए हितकारी सिद्ध हो। इस सम्बन्ध में मतभेदों की एक बात यह देखने में आती है कि अधिकांश लोग कर्मों का उत्तम या निकृष्ट होने का निर्णय बाहरी लक्षणों से निश्चित करते हैं और उसी आधार पर उसे अच्छा या बुरा कह देते हैं, पर अनेक बार ऐसा होता है कि जिस कार्य की लोग एक बार प्रशंसा करते हैं, वही आगे चलकर बुरा बतलाया जाता है, ये आप सभी पाठकों का भी अनुभव होगा या अनुभव कर सकते हैं। जिस काम को प्रकट होने में दूसरों की भलाई के नाम पर आरम्भ किया जाता है, उसी को आगे चलकर स्वार्थ साधन का जरिया बना लिया जाता है, तब वह दूसरे लोगों को खटकने लगता है और उसकी बुराई होने लगती है। हमको यह निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि कर्म का निर्णय उसके वाह्य रूप से कदापि नहीं हो सकता है, जब तक कि कर्ता की भावना का ध्यान न रखा जाय।विशेषत वर्तमान समय में तो जीवन-संघर्ष इतना कठिन, भयंकर हो गया है कि लोगों की स्वाभाविक सरलता, सज्जनता, सब समाप्त होती जा रही है,और झूठा प्रदर्शन तथा असत्य उपायों से काम लेना एक साधारण बात हो गई है। हो सकता है कि कुछ लोगों को ये बातें अच्छी न लगे लेकिन सत्य तो यही है। लोग सामने से कहते कुछ और हैं और मन में कुछ और रखते हैं ,दुनिया मे जो काम कठिन बतलाये जाते हैं उसमें स्वभाव का बदलना बहुत बड़ा काम है,स्वभाव आरम्भ से अपनी परिस्थितियों और आसपास के वातावरण के प्रभाव से धीरे-धीरे बनता है, पर जब वह एक बार किसी सांचे मे ढल जाता है तब उसका बदलना या बदल सकना बहुत ही मुश्किल काम होता है। आप/ हम दूसरों को तो सुमार्ग पर चलने का उपदेश तो सहज दे सकते हैं, उसके लिए कई उपाय भी बता सकते, पर स्वयं अपने को बदलना, बुराइया त्याग कर कल्याण कारी मार्ग पर चल सकना सहज नहीं है। अपनी भावनाओं को श्रेष्ठ बनाने और उनका कल्याणकारी प्रभाव अपने कर्मों पर डालने का पहला कदम यह है कि हम सदैव अपने मन का चित्तवृतियो का निरीक्षण करते रहे, हमको इस बात का ध्यान देना चाहिए कि हमारे भीतर कौन से दोष प्रवेश कर रहे हैं, बृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं, या हमारा अहित कर रहे हैं, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है कि ये आंतरिक दोष ही हमारे सबसे बड़े शत्रु होते हैं,जो कदम-कदम पर हमारी उन्नति में बाधा डालते हैं, पर वे ऐसे गुप्त रूप से हमारे मन और स्वभाव में घुसकर बैठ गये हैं कि हम उनको अपना शत्रु के बजाय मित्र समझने लग जाते हैं। हमारा हित इसी में है कि हम अपने विचारो को शुद्ध करें और भावनाओं को निष्पक्ष बनाएँ, तब हम उचित अनुचित का ठीक-ठीक निर्णय करके हितकारी कर्म करने में समर्थ हो सकेंगे। कर्म की प्रेरणा मनुष्य को प्रायः इच्छाओं, आकांक्षाओं से ही मिलती है।जैसी कामनाएं करते हैं कर्म भी वैसे बन जाते हैं। इसका हम सभी को ध्यान में रखना उचित ही होगा। कर्म का मूल मनुष्य की इच्छा है, अतः कामनाओं पर नियंत्रण रखना अति आवश्यक है। चरैवेति चरैवेति।
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