विग्रह से बचना श्रेयकर

 


हम/आप कई बार एक ही समय  अनेकों  विषयों  का चिन्तन  कर देते हैं, उनको क्रमबद्ध  रूप से हाथ  मे लेने की योजना  बना लेना  तो ठीक है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना  चाहिए  कि मस्तिष्क  जैसी संरचना शरीर की नहीं है,   उससे एक समय में  एक ही काम किया जा सकता है, कतिपय  लोग  यदि  ऐसा  सोचते हैं कि  हम एक समय में  बहुत सारे काम कर लेगें तो शायद ठीक नहीं  होगा और यदि करते हैं तो उन सभी कामो को वे अस्त व्यस्त कर देते हैं, कभी भी  हो अपने  लिये  एक समय  तालिका  बनाना  सुविधाजनक होगा  और उसके  अनुसार  एक के बाद दूसरा, तीसरा  आगे  बढ़ना  उचित ही लगेगा।  कभी-कभी हम कई लोगों  से काम करवाते हैं  तो उनको मार्गदर्शन  करते  रहना चाहिए ,जिससे  कि सभी  कामो को क्रमबद्ध  रूप  से पूरा किया  जा सके। बड़े   बड़े कार्यकारी  संस्थान  में  वेतन  जैसी  सुविधाओ का ध्यान  रखते हुए  यथा संभव  निर्धारित  काम कर देने के लिए  दबाव  दिया  जा सकता है, और अवज्ञा  करने पर उनकी  नौकरी  जाने, तथा  दूसरी  प्रकार की  पदोन्नति  रुक  जाने के लिए  भय बना  रहता है। इसलिए उस वर्ग  के साथियों  को मीठे शब्दों  में  किन्तु,,   सौंपा गया काम ठीक-ठीक  से करने  के लिए  दवाब डाला जा सकता है, किन्तु  सार्वजनिक  प्रयोजनों  के लिए  कर्तव्य  पालन के लिए  प्रोत्साहित  किया जाना चाहिए क्योंकि  तब  दूसरी  बात होती है, यदि कोई संगठन  में  या पार्टी  में  सदस्य  मूलतः  सेवा भावना  साथ लेकर आये  होते हैं, तो  इसका  उनको  गर्व  होता है  पर साथ ही साथ   यह व्यवधान  भी रहता है कि  ऐसी  श्रृंखला  के अधिकाँश  घटकों  में  अहंकार  तृप्ति  की महत्वाकांक्षा  की भी कमी  नहीं  रहती है। वे अपने  को प्रमुख  पद पर देखना  चाहते हैं  और साथ-साथ  इतना श्रेय  चाहते हैं, जो दूसरों  के  किये  गये कार्यों  के बदले  भी उन्हीं  को प्रशंसा  का पात्र  ठहराया जाय । यह एक पेचीदा स्थिति है। इसे सुलझाने  के लिए  लिए  मनोवैज्ञानिक  और भावनात्मक  स्तर  का कौशल  चाहिए, अन्यथा  साथियों  का इसी  अहमन्यता की चट्टान  से टकराकर  असहयोग  करने  लग जाना, विरोधी तक बन जाना  संभव है। इन्ही  छोटे कारणों से  अच्छे  भले  संगठन  बिखर जाते हैं,और कल तक जो सहयोगी  थे दूसरे दिन  विरोध करने पर उतारू  हो जाते हैं। अच्छे  भले  संगठन  इसी आधार पर  बिगाड़ते  व  बिखरते  देखे जा सकते हैं बिना  घनिष्टता-निकटता  का विचार  किये  जिनके द्वारा  कुछ  प्रशंसनीय  कार्य किये  है,वे अपने  आदर्शवादी  सदगुणों  का परिचय देते हैं, इसकी समय  समय पर  प्रशंसा  करते रहना चाहिए।इससे  अधिक  प्रयास  करने  का प्रोत्साहन मिलता  रहता है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना  रखा जाय कि अवगुणो की, भूलों  की चर्चा  मात्र  एकांत  में और सुझावपरक तरीके  से ही की जानी चाहिए, अन्यथा लोग  इसे  निन्दा  मान लेते हैं, और फिर शत्रुता  का भाव  भी रख सकते हैं। बड़े  परिवार का बिना  विग्रह  के चलते   रहना  बहुत  एक बड़ा काम है ,इससे  भी बड़ा  किसी  टीम,मण्डल का,पार्टी या संगठन  में सामंजस्य  बनाये  रखना है ।इसमें  संबंधो, मान्यताओं  और भावनाओं  का विशेष ध्यान  रखना  पड़ता है  सांथ  ही तलवार की धार   चलने  जैसा यह व्यवहार  भी निभाना  पडता है  कि सांप  मरे पर लाठी  न टूटे, की बात बनती रहे। दोष दुर्गणो  को अनदेखा  करने  से लेकर सुधार करने  तक का काम इतनी कुशलता  से करना  चाहिए  कि मन मैला न हो पाये।  सौजन्य  से,  निर्वाह  और लोगों  की आकांक्षाओं  का यथासम्भव  तालमेल  बिठाते  रहने  वाले  दूरदर्शी  और धैर्यवान ही किसी  बड़े  समुदाय  को संगठित  रख पाते हैं। जिनके बीच घनिष्टता  होती है, तो पडोसी  में  बसना  या आदान प्रदान  का सिलसिला  चलता रहता है, यह आपका भी अपना  अनुभव होगा, कि उनके  बच्चे  भी एक दूसरे के घर आने  जाने  लगते हैं और दोनों  में  प्रगाढ़ता  और भी अधिक  बढ़ जाती है।  यह दोनों  वर्गो  की ही समझदारी  दिखाती है, लेकिन  कभी-कभी  कोई  अप्रसंग  आते ही  दोनों  पक्ष  लड़ाई  झगड़े  के मूड में  आ जाते हैं  जिसको कि किसी दशा  में  ठीक नहीं  समझा  जा सकता है। लडाई में  अपनों  की हिमायत  की अक्सर  बहुत  बुरी  प्रतिक्रिया  होती है, सामने वाले अनुमान  लगाने  लगते हैं  कि अपने  ही हिमायत की गई और दूसरों  पर दोषारोपण  किया गया। इसलिए  उचित  होगा  कि हम सभी  इन बातों  से बचना होगा  और अपने  बच्चों को भी दूर रहने के  लिए कहना  होगा। झंझट भरी  घड़ियों  को  इसी  प्रकार  टाला जा सकता है, विग्रह  में  दोनों  पक्ष घाटे मे रहते हैं ,भले  गलती  किसी  एक पक्ष की क्यों न हो।  इसलिए   विग्रह  से बचना श्रेयकर  होगा।  चरैवेति चरैवेति। 

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