उत्तराखंड के जंगल एवं बाँध का पलायन व सुरक्षा से सम्बन्ध '

  


उत्तराखंड, पहाड़ी  प्रदेश  के साथ   सीमावर्ती  प्रदेश  भी है,जिसकी  सीमाएं, नेपाल, और चीन,   से लगी  हुई  है । पहाड़ी  प्रदेश  से लोग  रोजगार  व सुख  सुविधाओं के  लिए  बड़ी  मात्रा  में  पलायन कर चुके हैं  या  लगातार  पलायन  कर रहे हैं , जो कि राष्टीय सुरक्षा के लिए  भी चिन्ता का विषय  हो सकता है।किसी  क्षेत्र  से सूचनाओं का आदान-प्रदान ( local networking)पहले  वहाँ पर आवासीय  नागरिकों के  द्वारा ही या लोकल खुफिया तंत्र के माध्यमों  से सरकार  तक पहुँचती हैं, किन्तु  यदि  वहां  पर कोई  रहेगा  ही  नहीं  ,   तो  दुशमन  देशों को आसानी  से आने  जाने  व अवांछित  गतिविधियों को  करने में  आसानी हो   जायेगी  तो इसे  बड़ा  ही गम्भीर  विषयों  में  शामिल  किया  जा सकता है । सरकारों  के द्वारा  इस विषय   पलायन   को कभी  गम्भीरता  से  लिया  ही नहीं   गया है, चाहे  कोई  भी सरकार  रही  हो, जिसका परिणाम  आज  सबके  सामने है  पहाड़ी  प्रदेश  में  काफी  गाँव  खाली  हो गये हैं, जो भी सरकार  में  रहता  उनको  इस विषय  पर बहुत गम्भीरता से काम करना  होगा । जहाँ  नेपाल की सीमा उत्तराखंड  के   पिथोरागढ, चम्पावत,  और उधम सिंह नगर   जिलों  से लगती है  तथा  चीन  को  पिथोरागढ, चमोली, और उत्तरकाशी जिले  स्पर्श करते हैं ,   ऐसे  में  यदि इन सीमावर्ती  जिलों  से पलायन  होता है  तो यह राष्ट्रीय  सुरक्षा के लिए  चिंता  का विषय  बन सकता है,  सरकार  चाहे  केन्द्र  की हो या राज्य  सरकार  हो दोनों  को इस सुरक्षा पहलू  पर संज्ञान  लेना  उचित  होगा, इन क्षेत्र वासियों  को विशेष  सुविधा  भी दी जाती हैं  तो वह सर्वथा  उचित होगी,  जिससे  इन सीमान्त  जिलों  के लोग  असुविधाओं के कारण  पलायन की तरफ न जायँ। राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। यह न केवल देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा करने के बारे में है, बल्कि इसके नागरिकों की सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने के बारे में  भी महत्त्वपूर्ण  है। दूसरा  महत्वपूर्ण  विन्दु  उत्तराखंड  के सन्दर्भ में  यह है कि उत्तराखंड   में दो महत्वपूर्ण  प्राकृतिक  संसाधन   एक जंगल(वन) तथा  पानी  है और इनका   जिस तरह से दोहन किया  जा रहा है  यह भी आने  वाले  समय के लिए  चिन्ता  का विषय  हो सकता है, जिस प्रकार  विकास के नाम पर जंगलों  का कटान (बड़े  प्रोजेक्ट  के लिये) किया  जा रहा है , निश्चित  रूप से  पर्यावरण  संतुलन का खतरा  बढ सकता है, साथ में  जंगल  काटने  से  जंगली  जानवर विशेष कर चीता,  तेंदुआ, भालू  आदि   आवादी  की तरफ आ रहे हैं, जिससे  मानव जीवन के लिए  खतरा  पैदा  हो गया है।  नदियों  पर बड़े-बड़े  बांध  बनाये  जा रहे हैं, और उनकों  बनाने के लिये  भी सड़कों  का निर्माण किया  जा रहा है,  जिससे भूस्खलन  आदि का खतरा  बढ़ गया है।  अपने अनुभव    से जिसमें  मेरा  आरम्भिक  स्कूली   शिक्षा  एव   जीवन  पर्वतीय  क्षेत्र के गाँव  में  बीता  ,  तब न तो इतनी  आपदाये,  आते     देखीं है और न प्रकृति का इतना  भयावह  रूप देखा  , जैसे  कि   हाल के  वर्षों में पर्वतीय  क्षेत्रों में  हो  रहा है   आपदा  का घटित  होना  भी पलायन  के प्रमुख  कारणों  में  सम्मिलित किया जा सकता है  । मेरा  आशय यह भी नहीं है कि विकास के लिए  कुछ  न किया  जाय पर  आवश्यकता  के आधार  पर सीमित  मात्रा  में  ही  यह सब किया जाना  उचित होगा, जिससे  परिस्थितिक संतुलन  बना  रहे । सबसे  महत्वपूर्ण यह कि  एक बड़ी आवादी को  सुख सुविधाओं  से युक्त  व पर्वतीय  क्षेत्रों   में  रोजगार के  साधनों  को उपलब्ध  कराने के लिये  दीर्घकालीन  योजना  पर काम करना  होगा।  सरकार  पर सभी  नागरिकों  का बराबर   का  अधिकार  है चाहे वह  कोई  भी हो, सरकारो  को अपने  सभी  नागरिकों की सुख  सुविधाओं  को उपलब्ध  कराने  के बारे में  सोचना  व कार्य रूप में  परिणत   करना  चाहिए । चरैवेति चरैवेति। 





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