विद्या /शिक्षा (Vidhya/Education )
वैसे हर व्यक्ति विद्या के अलग अलग अर्थ निकालता होगा, लेकिन देखा जाये तो इसके मूलतः दो भाग हो सकते हैं एक शिक्षा दूसरी विद्या, सांसारिक जानकारी को शिक्षा कहते हैं जैसे भाषा, भूगोल गणित, कला, संगीत, इतिहास, साहित्य, शिल्प ,भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, न्याय, नीति आदि, और विद्या मनुष्यता के कर्तव्य और उत्तरदायित्व को आत्मसात करने को कह सकते हैं या जो सीखा है उसको मानव कल्याण के उपयोग में लाना है । शिक्षा को भी प्राप्त करना आवश्यक है विद्या को भी,और दोनों का होना मनुष्य के व्यक्तित्व में निखार आ सकता है। शिक्षा से सांसारिक जीवन की सम्पन्नता बढती है और विद्या से आत्मिक जीवन में सम्पन्नता बढती है। बौद्धिक विकास के लिए जिज्ञासा की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, आप सभी पाठक इस बात को महसूस करते होंगे कि हम तभी सीख सकते हैं जब हममें जिज्ञासा हो जिसके मन में जिज्ञासा ही नहीं होगी वह सीखने-सिखाने का कोई प्रयास ही नहीं करेगा। जिज्ञासा वाले के मन में अनेक तर्क़ वितर्क उठते हैं और उसके अपने मन में चिंतन, मनन,और कभी-कभी वाद- विवाद करने में रस आता है या मजा आता है और वह अपनी जानकारी बढाने की कोशिश करता रहता है जिससे उसको फायदा होगा, ऐसा करते करते उसे अनेक साधन भी मिलते रहेंगे। मूढ़मति मनुष्यों को जहाँ कोई खास बात नहीं दिखाई देती है, वही जिज्ञासु प्रवृत्ति के लोगों की सूक्ष्म दृष्टि वहां भी बहुत सी जानने योग्य बातें मिल जाती हैं जिससे वे अपना ज्ञान बढ़ाते चले जाते हैं। इसी जिज्ञासा के कारण वे अपनी शिक्षा में भी इजाफा करते हैं और साथ में अपनी विद्या में भी प्रगति करते रहते हैं। यदि यह कहा जाय कि जिज्ञासु होना विद्वत्ता/विद्वान् होने का पूर्व रूप है तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं होगा । जो लोग यात्रा, पर्यटन, समाचार पत्रों को पढ़ना, विचारपूर्ण पुस्तको को पढना, सतसंग, आम लोगों की मनोवृत्ति का अध्ययन करना,घटित होने वाली घटनाओं पर विचार, उनका निरूपण, विशलेषण करना एवं अनुभव आदि में रूचि लेते हैं तो वे मनुष्य बुद्धि मान हो ही जाते हैं। आप अपने आस-पास कई ऐसे लोगों को देखते होंगे जो आपसे ही तरह-तरह के प्रश्न करते हैं यह सब उनके जानने की प्रवृत्ति, जिज्ञासा के कारण करते हैं। ऐसा करते '-2 वे अपनी भूलों को भी सुधार देते हैं और सही निष्कर्ष पर पहुचने के लिए अपने मस्तिष्क को भी खुला रखते हैं और उपयोगी जानकारी/ ज्ञान को पर्याप्त मात्रा में संकलित कर लेते है ।समर्थक और विरोधी दोनों तथ्यों को समझने और उनकी विवेचना करने के लिए जो लोग प्रस्तुत रहते हैं, वे श्रम से,अज्ञान से बचकर वास्तविककता तक पहुँच जाते हैं। अपनी जानकारी को अल्पता में समझना, और अधिक मात्रा में एवं अधिक वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने की निरंतर चाहत रखना मनुष्य को और अधिक ज्ञानवान बनाती है , और जो लोग ऐसे अवसरों की तलाश में रहते हैं ,अवसर मिलने पर उसका लाभ उठाते हैं उनकी शिक्षा व विद्या बढती चली जाती है। इसलिए हम सभी को हर से , हर परिस्थिति से हर क्षेत्र से , हर स्तर से सीखने के लिए जिज्ञासु रहना ही चाहिए, व आनी आने वाली पीढ़ी को भी प्रेरित करना उचित ही रहेगा । चरैवेति चरैवेति।
बहुत सुंदर sir जी
जवाब देंहटाएंशिक्षा और विद्या को हम कह सकते है की ज्ञानेंद्रियों को कर्मवेन्द्रियों मे समावेषित करना या आत्मसात करना ही है जो हमे अनुभव से ही प्राप्त कर सकते है।
सादर
बहुत सुन्दर, टिप्पणी, धन्यवाद
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