अनुभव (Experience)
आज एक महत्वपूर्ण ब्लाग शिक्षा व्यवस्था पर, लिख रहा हूँ और अपने अनुभवों के आधार पर , सभी के लिए चाहे वह शिक्षक हो, नीति निर्धारण करने वाले हों, अभिभावक हो, या प्रशासन में तैनात अधिकारी /कर्मचारी हो सभी को इस पर चिन्तन करना होगा। मै 35 साल शिक्षा से जुड़ा रहा हूँ और सभी पदो पर ( शिक्षक, ,प्रधानाचार्य , खण्ड शिक्षा अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी, मुख्य शिक्षा अधिकारी, डायट में वरिष्ठ प्रवक्ता, सर्व शिक्षा अभियान में विशेषज्ञ,विभागाध्यक्ष सीमैट आदि पदों ), कार्य करने का सौभाग्य मिला । किसी भी राष्ट्र व देश के विकास में वहां के नागरिकों का अहम योगदान होता है, और योग्य नागरिकों के निर्माण में वहां की शिक्षा व्यवस्था का अहम व सार्थक योगदान होता है, हम स्कूल मे क्या सीख रहे, या शिक्षक हमें क्या सीखा रहे हैं , इसके लिए स्कूल में एक मजबूत प्रबन्ध होना चाहिए ( नेतृत्व), प्रबन्धन के महत्वपूर्ण हिस्से में स्कूल का प्रधानाचार्य (नेतृत्व) होता है जो कि स्कूल को अच्छे से चलाने/व्यवस्थित करने के लिए समय-समय पर आवश्यकतानुसार निर्देश जारी करता रहता है , लेकिन स्कूलो में काफी समय से प्रधानाचार्य ही नहीं है, यहाँ तक किसी स्कूल ने स्थापना के समय से ही प्रधानाचार्य नही देखा फिर उन स्कूलों के बारे आप सभी भी आकलन कर सकते हैं, कि उसका प्रबनधन कैसा होगा, ? महत्वपूर्ण पदों ( शीर्ष पदों) पद रिक्त होने के तुरंत उस पद पर नियुक्ति या तत्काल व्यवस्था के लिए आदेश जारी किये जाते हैं, इसलिए कि अव्यवस्था न रहे, लेकिन शिक्षा संस्थानों के मामले में यह कभी नहीं हुआ, और सालों साल तक पद रिक्त रहता है। मेरा अनुभव यह कहता है कि कि प्रधानाचार्य का पद किसी भी दशा में रिक्त नहीं रहना चाहिए, क्योंकि सारी शैक्षणिक गतिविधियां प्रधानाचार्य के नियंत्रण पर व उसके अनुशासन के अनुसार ही स्कूल में चलती है, दूसरा शिक्षक दीर्घकालीन व नियमित व्यवस्था के अनुसार ही नियुक्तियां हो , न कि वैकल्पिक व्यवस्था हो, यदि व्यवस्था करनी पड़ी तो ऐसी कि उस शिक्षक ( व्यवस्था वाले शिक्षक) को ऐसा लगे कि एक नियमित अन्तराल के बाद उसको नियमित होना है, जिससे उसकी कार्य के प्रति स्थिरता/लगन बनी रहे । शिक्षक के पद रिक्त रहने से शिक्षण व्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है, चूंकि ये विन्दु सरकार से जुड़े हैं इस पर सम्बन्धित सरकारो को दीर्घकालीन नीति बनायी जानी उचित होगी, मै अपने विद्यार्थी जीवन को याद करता हूँ ( सब सरकारी स्कूल से) तो तब स्कूलों 26 जनवरी, 15 अगस्त व 2अक्तूबर को ही शैक्षणिक कार्य न होकर अन्य गतिविधियों/रैलीया आदि होती थी व अन्य दिनों में केवल और केवल शिक्षण कार्य ही होता था, पर आज आये दिन कई प्रकार के कार्य यथा विभिन्न प्रकार के दिवसो, रैलियों,,आयोजनो की भरमार हो गयी है, साथ में कुछ समय विभिन्न प्रकार के फार्म ( शिक्षक विभिन्न प्रकार के फार्म भरने , व डाटा भरने , अन्य ग़ैर शैक्षणिक कार्यो, online work जो कि एक दिन मे ही मांगे जाते हैं लगे रहते हैं ) भरने में, जो कि शिक्षण कार्य को प्रभावित करती है, साथ में यह भी कि, अभी दो और तत्काल दो, यह स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती है यदि यह कहा जाय कि स्कूल में शिक्षक/ प्रधानाचार्य केवल event manager का कार्य कर रहे हैं या करवा रहे हैं, तो कोई गलत नहीं होगा । मेरा अनुभव यह है यह कार्यक्रम केवल सरकारी स्कूलों में ही अधिकतर होते है। कुछ लोग हो सकता है कि यह भी कहें कि आप भी तो शिक्षा विभाग से और महत्वपूर्ण पद से सेवानिवृत्ति हुये हैं , मै अपने बारे में कुछ कह नहीं सकता और न कहना चाहिए इसका मूल्यांकन समाज में जिन के बीच रहकर काम किया वही बता सकते हैं, लेकिन जहाँ पर भी अवसर मिला , अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर कार्य किया है और अपनी सामर्थ्य व सीमा के अनुसार अच्छा करने का प्रयास किया है । एक महत्वपूर्ण विन्दु यह कि जिला स्तर या ब्लाक स्तर के शिक्षा विभाग के अधिकारी अधिकतर अन्य कामों (शिक्षा को छोड़कर) मे ही लगे रहते हैं, यह महसूस किया जा सकता है, मैं स्वयं भी विभिन्न पदों पर रहा हूँ, अधीनस्थ अधिकारी व कर्मचारी को अपने शीर्ष अधिकारी के आदेशों का पालन करना ही पड़ता है चाहे वह कोई भी हो, और किसी भी पद पर हो । प्रशासन की मजबूरी है कि वह अधिकतर शिक्षकों से या उनके जिला/ब्लाक स्तर के शिक्षा अधिकारी से ही कई गैर शैक्षणिक कार्य इसलिए करवाये जाते है कि एक तो उनके पास man power अधिक है , दूसरा उनकी पहुँच समाज में सभी घरों तक है, जबकि मेरा अनुभव यह है कि उनको (शिक्षकों को )अधिक से अधिक स्कूलों मे तथा अधिकारी को अधिक स्कूलों का अनुश्रवण करना चाहिए, पर ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है । एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इस समय शिक्षकों/विभाग पर लोग अविश्वास कर रहे हैं और विभिन्न उपकरणों यथा ऐप, bio metric आदि तरह-तरह के उपकरण, या प्रमाण देने के लिए निर्देश जारी कर रहे हैं , इसको किसी भी दशा में उचित नहीं कहा जा सकता है इससे एक अविश्वसनीय की समस्या पैदा हो रही है , शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय /कार्य में लगे लोगों पर अविश्वास करना बहुत ही निराशाजनक है , हो सकता है 1 या 2 प्रतिशत लोग लापरवाही करते हो और यह किसी भी स्तर पर चाहे वे अधिकारी वर्ग हो या अन्य उच्च स्तर पर भी हो सकता है , न कि केवल शिक्षक मे, लेकिन सभी को एक जैसे समझना उचित नहीं कहा जा सकता है।समाज में विभिन्न सेवा में आने वाले समय में सभी व्यवसायी आज के छात्र ही होंगे उनको जैसा सिखाया जायेगा, या जैसे सीखेगे वैसा ही वे समाज को लौटायेगे, इसलिये शिक्षा देने के प्रबन्धन में किसी भी दशा में किसी भी स्तर पर उदासीनता उचित नहीं होगी व शिक्षकों पर भरोसा/ विश्वास करना ही होगा तभी शिक्षा में सुधार होगा और शिक्षा बची रहेगी ऐसा मेरा मानना है । अभिभावकों को भी शिक्षकों पर भरोसे के साथ-साथ उनके मान सम्मान का भी ध्यान रखना ही श्रेयकर होगा। इस पर सभी को( अभिभावकों को, विभाग व सरकार को) को सोचना ही होगा। चरैवेति चरैवेति ।
अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता है।🙏
जवाब देंहटाएंआप का यह लेख शिक्षा व्यवस्था की जमीनी सच्चाइयों और गहरे अनुभवों का सार प्रस्तुत करता है। आप ने अपने 35 वर्षों के दीर्घ अनुभव से जो बातें रखी हैं, वे न केवल शिक्षकों के लिए बल्कि नीति-निर्माताओं, प्रशासन और अभिभावकों — सभी के लिए विचारणीय हैं।
जवाब देंहटाएंप्रधानाचार्य पद की रिक्तता, शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ, और शिक्षा विभाग में प्रबंधन की कमियों पर किया गया विश्लेषण बहुत यथार्थपरक है। लेख यह स्पष्ट संदेश देता है कि “शिक्षा केवल कार्यक्रमों या औपचारिकताओं का नाम नहीं, बल्कि भावनात्मक और बौद्धिक विकास की निरंतर प्रक्रिया है।”
आप ने सही कहा है — शिक्षा में सुधार तभी संभव है जब हम शिक्षकों पर विश्वास करें, उन्हें सम्मान दें, और शैक्षणिक गतिविधियों को प्राथमिकता में रखें। यह दृष्टिकोण न केवल शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाएगा, बल्कि समाज में नैतिक और जिम्मेदार नागरिकों के निर्माण की नींव भी मजबूत करेगा।
संक्षेप में: कहें यह लेख शिक्षा व्यवस्था के सुधार हेतु आत्ममंथन का आह्वान करता है और प्रेरित करता है कि सभी संबंधित पक्ष — शिक्षक, अभिभावक, अधिकारी और सरकार — मिलकर शिक्षा को उसकी वास्तविक गरिमा लौटाएँ।
चरेवेति चरेवेति — अर्थात् सतत् आगे बढ़ते रहना ही प्रगति का मार्ग है।
धन्यवाद जी
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