बूढ़े न बने (Don't get old)
लम्बी शासकीय या अशासकीय सेवा करने के बाद एक समय ऐसा आता है ,जब जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा विताने के बाद व कई जिम्मेदारियों को निभाने के बाद व्यक्ति को सेवानिवृत्ति कर दिया जाता है। उसकी कार्यक्षमता ,शारीरिक क्षमता अन्य लोगों की अपेक्षा कमतर हो जाती (ऐसा मान लिया जाता है) उसे आराम करने के लिए कह दिया जाता है, जब व्यक्ति को सेवानिवृत्ति घोषित कर दिया जाता है तो उसकी मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आर्थिक दृष्टि से कुछ कमा नहीं पाता, जिस कार्य स्थल पर इतने लंबे समय से कार्य कर रहा है, वहां उसकी उपयोगिता प्राय खतम हो जाती है, और उसके सामाजिक संबंधों पर भी असर पडता है। उसे अकेलापन व महत्वहीनता महसूस होती है, जिसके कारण कई बार वह पहले की तुलना में अधिक तनाव ग्रस्त रहने लगता है, और उस स्थिति में और अधिक परेशानी होती है, जब सेवा के दौरान आपने एक विशेष दूरी जन सामान्य के साथ बनायी है क्योंकि तब जन सामान्य भी आपके उस व्यवहार के कारण हो सकता है आपसे दूरी बना दे और तब आपको बहुत खराब लगेगा (हो सकता है) । सेवानिवृत्ति के बाद स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं मे भी इजाफा होता रहता है मनोविज्ञान के जानकार भी यह कहते हैं कि कामकाजी जिंदगी का अंत न केवल अकेलेपन को दावत देता है बल्कि बुढापे मे यह तनाव की मुख्य वजह भी बन जाती है, इसी कारण जीवन की इस अवधि में ज्यादातर लोग स्वास्थ्य समस्याओं, आर्थिक असुरक्षा और अवसाद से घिर जाते हैं, आप सभी पाठकों का भी इस पर अपना अपना अनुभव होगा कि आपको कैसा लग रहा है? 60-70 की उम्र के बाद देखा जाये तो जीवन की साँझ आरम्भ हो जाती है, जीवन भर जो अच्छा या बुरा किया है उसके प्रभाव व परिणाम इस उम्र में दिखने लगते हैं या याद आ रहे होते हैं, हालांकि इस उम्र में शरीर जल्दी थक जाता है , शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है, करने के लिए कोई विशेष कार्य नहीं होता है (अधिकतर लोगों के लिए), समय काटे नहीं कटता है, अकेला पन महसूस होता है, सम्मान की कमी महसूस होती है, फिर भी देखा जाय तो जीवन का यह समय सुकून का होता है, जिसमें कोई जिंदगी पर ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करता, हम कार्य करें या न करें इसका कोई दवाब नहीं होता है, जीवन के इस समय में यदि कर्ज, पारिवारिक जिम्मेदारीयो का बोझ न हो तो जीवन सुकून से विताया जा सकता है। यह भी सच है कि जिंदगी के इस ढलते पहर में व्यक्तियों को केवल सम्मान, सहानुभूति की ही नहीं अपितु बहुत सारे संसाधनों की जरूरत होती है,जो उन्हें नहीं मिल पाते हैं और न मिलने के कारणों से वे उदास हो जाते हैं या परेशान दिखायी देने लगते हैं। ऐसा नहीं है जीवन के इस रास्ते पर एक या दो को जाना है जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस अवस्था से तो गुजरना ही पडेगा, फिर क्यों न इस रास्ते को सुकूनदायक, संतोषजनक बनाया जाय ? इसके लिए सबसे पहले अपनी-अपनी मानसिकता में बदलाव लाना जरूरी है, इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम बूढ़े नहीं वृद्ध बनें। बुढापा और वृद्धावस्था दोनों में बहुत अन्तर है। बुढापा कष्टदायक होता है तो वृद्धत्व सुख - शांति का सागर है, पूर्णता और तृप्ति की अनुभूति है,अनुभवों का भण्डार है, जिसने विकास के चरम को पा लिया है, अपने अनुभव से जान लिया है कि जिसके ज्ञान, विज्ञान, विवेक,बुद्धि का दुनिया सम्मान करती है, उसे प्रेम करती है और उसे सिर आखों पर बिठाती है ।बुढापा और वृद्धावस्था दोनों जीवन की अवस्था की ओर संकेत करते हैं, लेकिन दोनों के प्रति हमारा नजरिया अलग-अलग हो जाता है, बुढापा एक तरह नरकीय जीवन है,शरीर में कार्य करने की शक्ति नहीं रहती है, तरह-तरह की बीमारियों से शरीर घिरा रहता है, आखों से कम दिखाई देता है, कानों से कम सुनाई देता, जोड़ों में दर्द, सिरदर्द, कमर दर्द आदि कई और विकृतियों से शरीर घिरा रहता है, कुल मिलाकर जीवन आत्मनिर्भर न रहकर परावलम्बी हो जाता है, इसीलिए बुढापा कष्टप्रद कहा जा सकता है, लेकिन वृद्धावस्था में इन सब लक्षणों के बावजूद व्यक्ति जीवन का विशेषज्ञ बन जाता है, अपने अनुभवों से अपनी सलाह से वह दूसरों के लिए अमूल्य बन जाता है लोग उसकी मदद् करते हैं, उसका भरपूर सहयोग करते हैं, सम्मान करते हैं, उसके अनुभवों से सीखते हैं, इसलिए हम सभी को भी अपनी उपयोगिता बनाये रखनी होगी और बूढ़े न बने वृद्ध बने । साथ साथ में अकेले न रहे, स्वाध्याय करें, समय के साथ चलें, घरों में बच्चों को संस्कारवान बनाए, स्वास्थ्य का ध्यान रखते रहे, आर्थिक दृष्टि से सक्षम बने रहे आदि। चरैवेति चरैवेति।
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