तनाव प्रमुख रूप से किन कारणों से पैदा होता है (causes of stress)

   


   क्या  आप  ने सोचा  कि  कभी-कभी  आप बहुत  उद्वेलित  हो जाते हैं  और फिर आप अपने  को असहज  महसूस करते हैं,  ये सब इसलिए  होता  है कि आप तनाव  में  जी रहे हैं  । हम  सभी   जब  कोई  काम  करते हैं , तो कभी  न कभी  किसी  प्रकार के   तनाव  से जूझते रहते हैं  या हम  सभी को  सामना करना  पड़ता है।  सामान्य  परिस्थितियों  में  थोड़ा  भी व्यतिक्रम  आने पर  गड़बड़ाना  नहीं  चाहिए  , अपितु अपनी  प्रतिरोधी  सामर्थ्य, संकल्प  के सहारे  कोई  न कोई  रास्ता  निकाल  लेता  या  निकाल  लेना चाहिए  । एक प्रतिपादन  यह भी है कि  प्रतिकूलताओ  का  सामना  करते हुए  किसी  की भी सामर्थ्य  और भी बढ़ जाती है, उसका  अवलम्बन  लेकर  वह कभी-कभी  असमान्य पुरुषार्थ  कर लेता है। प्रबन्ध  व्यवस्था  में   में  चूंकि  अनुकूलताओ  के साथ  ही प्रतिकूलताओ  का भी सामना करना पड़ता है, उसे सुप्त  पड़े  ऊर्जा के  स्रोत को जगाना ही पड़ता है। तनाव (stress) के बारे में  इन दिनों  प्रबन्धन   व्यवस्था  पर काफी  विस्तार  से चर्चा  होने  लगी है, यहाँ  तक किसी  भी प्रशिक्षण  कार्यक्रम में  एक दो सत्र तनाव  पर दिये  जा रहे हैं  जिससे  वे बिना  तनाव के अच्छे  से अपना  कार्य  कर सकें। तनाव  एक ऐसी  स्थिति  है  जो सीधे  मानसिक  स्वास्थ्य पर प्रभाव   एवं  इसके  फलस्वरूप  प्रबन्धको के निर्णय  क्षमता  पर  प्रभाव  डालती है और यदि  निर्णय  ही प्रभावित  होंगे तो प्रबन्ध  व्यवस्था  प्रभावित होने  लगेगी, उस दशा में  group  leader की अक्षमता  सामने  आ जायेगी  जिससे  समूह का मनोबल गिर जायेगा। तनाव  शब्द  पदार्थ  विज्ञान  से लिया गया है  वहां इसका  प्रयोग तब होता है  जब किसी  पदार्थ   पर बल,दबाव  इस सीमा तक पड़े  कि वह खिंचाव  की चरम  सीमा  पर पहुचने के  बाद  टूटने की स्थिति में  मे आ जाये।  जब यही    बात  मनुष्य  पर  लागू  होती है, तो     एक तथ्य  यह स्पष्ट  होता है  कि मनुष्य  कोई  धातु  या चट्टान   तो है नहीं,  वह जीता  जागता  सामर्थ्य  का पुंज है, ऊर्जा का भण्डार  है। वह एक विशेष  स्थिति  तक ही दबाव  या तनाव (stress) सहन  कर सकता है, किन्तु भावनात्मक  दबाव,  वाह्य  तनाव  जब एक सीमा  विशेष  को पार कर जाता  तो मनुष्य  टूट  जाता है,   उस पर  तीव्र  प्रतिक्रिया  होती है  अथवा  अनुकूल  प्रक्रिया  द्वारा  वह स्वयं  को बदली  पपरिस्थति  के अनुरूप  बना लेता है,   यह  आप सभी पाठक  गणों  का भी अपना - अपना अनुभव भी  होगा, इसको देखते  हुये  अपने अपने  निर्णय  ले रहे  होंगे/लेना चाहिए।  हर  व्यक्ति के  अन्दर  एक ऐसा  जैविक  सन्तुलन  स्थापित है,  कि जब भी उस पर तनाव  को जन्म  देने  वाली  स्थिति  पैदा  होती है, तो तत्काल  दो परिस्थितिया पैदा होती है या दो प्रतिक्रिया  पैदा होती है, एक  परिस्थितियों  से लडो  या   दूसरी भाग जाओ, व्यक्ति  बहादुर  है यदि  वह लड़ता है, कायर  है  यदि  भागता  है, एवं  बुद्धिमान हैं  यदि  वह उस परिस्थितियों   से तालमेल  बिठा कर चलता है । यह निश्चित  है कि हर व्यक्ति  मे stress  उसकी  वैयक्तिक  विशेषताओं  के अनुरूप  भिन्न भिन्न  प्रतिक्रियाये  उत्पन्न  करता है, कोई  उद्विग्न बन जाता है, कोई  चुनौती  से लडना/जूझने  की  शक्ति  से परिपूर्ण  हो जाता है। तनाव  अपनी अपनी  व्यक्तिगत , पारिवारिक,  संस्था  के मुखिया  के नाते  भूमिका  व सदस्यों  से टकराने  से भी  पैदा  होता है। यदि  आप  अपने  वर्तमान  स्तर  पर ही रुके  है (कोई  पदोन्नति  नहीं हो रही, स्थानान्तरण  नहीं  हो रहा है) यह भी तनाव  का कारण  हो सकता है। अपने  साथियों, वरिष्ठ  व कनिष्ठ  लोगों  से वैयचारिक  टकराव  से भी तनाव  हो सकता है। कभी-कभी अपनी  भूमिका  को भी गौण समझने  व दूसरे  को तुम्हारे  काम का श्रेय  ले जाने  के कारण, काम की  अधिकता  या क्षमता  से अधिक  काम, संसाधनों की कमी  के कारण  भी  तनाव  पैदा  हो जाता  है। कभी-कभी  अपनी  भूमिका  से दूसरों  का न जुड़े  होने  व स्वयं  अकेला  होना  भी आपके  तनाव  का कारण  हो सकता है  अन्य  भी कई और तनाव के कारण  हो सकते हैं  वह अलग-अलग  लोगों  के लिए  अलग-अलग  हो सकते हैं। स्वास्थ्य भी तनाव  का कारण हो सकता है। मेरा  अनुभव  है कि हर किसी  को किसी  न किसी  तनाव  से जूझना  पड़ता  ही  है  अपनी  बुद्धिमत्ता से  इसको हल करना    व तनाव  को   झेलने  की आदतों  में  विकास  करना  ही बुद्धिमान  होने  की  ओर  इशारा  हो सकता है  । चरैवेति चरैवेति। 

 


  

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