हम कहाँ जा रहे हैं और क्या सीखा रहे हैं ?(where are we going and what are we teaching?)

   


    सभी  ने  अपने अपने  घरों  में दीपावली   के समय  के समय  विभिन्न प्रकार की  सजावट की,सभी  ने अपने अपने  परिवार में  व अपने  परिजनों, मित्रों  आदि  को  बधाई  व शुभकामनाए  भेजी, विशेष  पकवान मिठाईयाँ  बनायी  गयी   होंगी   , पूरा social मीडिया  बधाई एवं शुभकामनाओं  से भरा था  ये आप सभी  पाठकों  ने देखा  भी है  और स्वयं   भेजा भी है ,अच्छी  बात है, ठीक भी है  साल  में  एक बार  ही  दीपावली  आती है  सभी  ने  इसकी तैयारी की होती है  ,लेकिन  कष्ट   इस बात का  है  कि  दीपावली व  लक्ष्मी    पूजन   दीपमाला   आदि  की  सामग्री (फोटो, फूल आदि)  जो कि  पूजा तक तो  महत्व  रखता है,   लेकिन  अब वह बेकार  हो गया है   और उसको अपने  घर के पास वाले  या किसी  दूसरे मन्दिर  में  रख देते हैं और वहां  पर स्थित  पुजारी  परेशान  है कि इसको  कहाँ  रखू,   मन्दिर  को कूड़ा  घर बना  दिया है, ये कहाँ  तक सही है  ? । कितनी खराब  स्थिति है ये,  आज सुबह   जब मैं  दूध लेने  जा रहा था तो पास के मन्दिर में  कुछ  लोग  अपने  घर मे से  उस कूडा को,व फोटो  को  रखने  के लिए  ला रहे थे,   जिसे कि किसी  भी दशा  में  उचित  नहीं  कहा  जा सकता है,   अपने  घर की आपने/हमने  सफाई की,  होगी   और  सुन्दर  बनाया  होगा   और  अब  उस कूडे  को जिसे,  आप ये भी सोचते हैं  कि हर जगह नहीं  फेकना  चाहिए, उसको  उठाकर  नजदीकी  मन्दिरो मे रख रहे हैं,  ये  सब  आप/हम    अपनी  नयी  पीढ़ी को भी  क्या  सिखा  रहे हैं,  स्वच्छता  पर मेरे  द्वारा  एक पूर्व  में  एक ब्लाग   लिखा  गया है, जिसे आप पढ़  सकते हैं  । माननीय प्रधानमंत्री  जी  का महत्वकांक्षी  अभिनव  कार्य  योजना   को  इस प्रकार  ठेंगा  दिखाना   अच्छे  नागरिक  की  निशानी  नहीं  हो सकती है।  ऐसे  लोग   किसी  भी  दशा  में  अच्छा   कार्य  नहीं  कर रहे हैं,  स्वयं  से भी पूछ कर देखें  कि क्या  आप कूड़े  को मन्दिर  मे रखना  उचित  है   , आज जबकि  नगर निगम  की कूड़ा  गाड़ी  घर  घर जा रही है   लेकिन कुछ  लोगों  की आदतों  में  ये बात  समाहित  हो गयी है  कि कूड़ा  या तो दूसरों  के घर के पास, या सार्वजनिक स्थलों  सड़क  में  या  नजदीकी  नदियों या नालों  में  फेकते  है एक दो  बार उनको टोका  भी गया है, शायद  कई लोग  कहते  भी होंगे,   लेकिन  उल्टे वे लोग  उनसे   झगड़ा  करने  के लिए  तैयार रहते हैं। मैने  देखा  कि  कई स्थानों  में  तो  एक  नोटिस बोर्ड  भी लगया गया कि यहाँ  पर कूड़ा  न फेंके   लेकिन   वही  पर कूड़ा  फेका  दिखाई देता है,  कोई  फायदा नहीं  दिखाई दे रहा  है । यह    किसी  भी शिक्षित   नागरिक  के लिए  उचित  नहीं है ।ऐसा  नहीं  है यह एक जगह  या शहर में  है मेरा  अनुभव  है कि यह  आते  जाते  कई जगह और शहरो मे   भी   देखा  जा  सकता   है,  और आज सुबह तो अपने  आखों  से   कूड़ा  रखते   हुये    देखा  , पता  भी  है  किसने  फेंका, बात भी की है, भविष्य  के लिए  ऐसा  न करने  के लिए  भी आशवासन   भी लिया, लेकिन एक से बात नहीं  बनेगी  सभी  को चाहे  वह कहीं  पर भी निवास कर रहे   हो सजग  रहना  होगा, औरों के लिए  उदाहरण  भी पेश करना  होगा।   साथ साथ में  अपने  बच्चों  को अपने  सभी  परिचित  को  भी   इस   blog के इस शीर्षक   को  कि "  हम   क्या  सीख  रहे हैं  और  क्या  सीखा  रहे हैं",  भेजना  उचित  ही रहेगा।    चरैवेति  चरैवेति। 







टिप्पणियाँ

  1. वर्तमान परिस्थितियों में समाज का अंधापन और बढ़ते शहरीकरण के कारण ख़पत सौ गुनी प्रतिदिन की और उत्पादकता गमलों में और छत कृषि तक सिमटकर रह गई है।

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