ट्यूशन/कोचिंग (Tuition/coaching)

   


वर्तमान  समय में  मै देखा जा  रहा  है कि  tuition  और coaching  का एक दौर  चल रहा है, कि लगभग  हर माता-पिता  तब तक संतुष्ट  नहीं  हो रहा है,  जब तक  कि वह अपने  बच्चे  को  tuition  न भेज दे या,  यदि  वह secondary  में  पढ रहा  है तो coaching  न भेज  दे,  कई बार तो  देखा  जा रहा  है,  या आप भी अपने  आस-पास  अनुभव  कर रहे होंगे,   कि बच्चा  अभी  प्रारम्भिक  कक्षाओं में   ही  पढ  रहा है  और उसके  माता-पिता या अभिभावक  उसको tuition  या coaching    संस्था  में  छोडने  और लेने  जाते  दिखायी  देते हैं, मै यह नहीं  कह रहा हूँ   tuition  या coaching  न दो, लेकिन  यह देखने  का काम तो है ही कि बच्चों  को क्या  वास्तव में  tuition  की आवश्यकता है  और कई बार तो यह देखने  में  भी आ रहा  है कि बच्चों  के पास जितने  विषय  हैं  सबके  सब विषयों   का tuition  ही लगा  रखा है। छात्र या  छात्रों  के दिमाग  को  मशीनवत  की तरह  उपयोग  किया  जा रहा है  मेरा  अनुभव  ये कहता है कि    किसी भी  पढने वाले  बच्चे को को  उसे  अपने  दिमाग  का उपयोग  करने  देना  चाहिए,   जिससे  कि उसकी  क्षमताओं  में  बृधि  हो,  इस पर   पूर्व  में  भी ब्लॉग  लिखे गये हैं।  बिना  आवश्यकता  के tuition  देना  किसी  भी दशा  में  उचित  नहीं  कहा जा सकता है। एक महत्वपूर्ण  बात यह  है,   कि  पढ़ाने, और पढने की अवधि  के  बीच  एक संतुलन (एक गैप  ) होना आवश्यक  होता है,   आज अभिभावक  चाहता  है कि   मेरे  बच्चे  को  वह सब एक ही कक्षा  में   और एक ही समय  में   आ जाय जिसके  लिए   पूरे  साल  का  समय निर्धारित किया  गया है  , किसी भी  कक्षा  के पाठ्यक्रम  के लिए  एक साल का समय तय किया गया है और यदि  हम सोचे कि  एक दो माह  में  मेरे  बच्चा  सब  सीख जाय , जो कि सम्भव ही   नहीं है और यदि  जबरदस्ती  करेंगे तो कुछ  न  कुछ  विकृति  पैदा  हो जायेगी । आप सभी पाठकों का भी  अपना  अपना  अपना  अनुभव होगा कि,  जब हम खाना  खाते हैं  तो दूसरा कौर मुँह  में  तभी  डालते  है,  जब पहला चबाने के बाद निगल लेते हैं ,  यदि  जबरदस्ती  करेंगे  तो उल्टी हो जायेगी,   यही  बात मेरे  विचार  से पढाई  -लिखाई में  भी लागू  होती है  जब एक  विषय (sub topic) अच्छी  तरह याद/ समझ हो गया  है तभी  आगे  बढ़ना उचित  होगा  और धीरे-धीरे  ही आगे  बढा जाय। आप सभी का भी अपने  बच्चों  के साथ अपना  अनुभव  होगा  । एक सीधा  चिंतन  ये है कि यदि  अक्षर और मात्राओं  का ही ज्ञान  न होगा  तो शब्दों  और वाक्यों  को कैसे  पढेंगे  और लिखेगें। इसलिए  यदि  आवश्यकता है  तभी  tuition  और coaching  मे भेजना  उचित  होगा  और उन्ही  विषयों  में  जिसमें  बच्चा को कम समझ  आ रहा है  या उसको  समझने में  परेशानी  आ रही है । कई बार coaching  के दुष्प्रभाव  भी देखने  को मिलते हैं ,कोचिंग के दुष्प्रभाव विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं, मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव, कोचिंग के दौरान छात्रों पर अत्यधिक दबाव और तनाव हो सकता है, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। लगातार प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के कारण छात्र अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं का सामना कर सकते हैं।शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव, कोचिंग के दौरान छात्रों को पर्याप्त नींद नहीं मिल पाती है, जिससे उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।  छात्रों को अपने खान-पान पर ध्यान नहीं देने के कारण पोषण की कमी हो सकती है।  कोचिंग के दौरान छात्रों को अपने दोस्तों और परिवार से दूर रहना पड़ सकता है, जिससे उनके सामाजिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मै ये कदापि  नहीं  कह रहा हूँ  कि tuition/  कोचिंग  न दो, किन्तु  यह देखना  आवश्यक है कि  यदि  आवश्यकता है तो  दो  ,अन्यथा  नहीं,  देखा  देखी में  कि पड़ोसी या रिश्तेदार  भेज रहे हैं  तो मैं  भी भेज दूं,  या बच्चे  की इच्छा  नहीं है उसको  जबरदस्ती  भेज दिया गया है और बाद में  उसके  परिणाम  अच्छे  न मिले। : लगातार दबाव और तनाव के कारण छात्रों के संबंधों में तनाव आ सकता है। कोचिंग  के दौरान छात्रों को रचनात्मकता की कमी हो सकती है, क्योंकि वे केवल पाठ्यक्रम पर ध्यान केंद्रित करते हैं। लगातार दबाव और तनाव के कारण छात्रों की सीखने की रुचि में कमी आ सकती है। इन दुष्प्रभावों को कम करने के लिए, छात्रों को अपने समय का प्रबंधन करने, नियमित व्यायाम करने, और अपने मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने की आवश्यकता है। साथ ही, कोचिंग संस्थानों में  छात्रों की आवश्यकता   के अनुसार   भेजा जा तो उचित रहेगा   , इस बात  का विशेष  ध्यान  रखा जाना चाहिए कि  ,  बच्चे  का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य   ठीक  रहे  ।।चरैवेति चरैवेति। 

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