प्राथमिक शिक्षा (Primary Education)

     




     किसी  के  भी जीवन में  प्राथमिक  शिक्षा  का कितना  महत्व  होता है  यह हम  सब भलीभांति  समझते है,   कि  जिस  प्रकार  किसी  भवन की मजबूती  उसके  नीव पर निर्भर करती है, उसी प्रकार  शिक्षा  में  भी  प्राथमिक  शिक्षा  का महत्वपूर्ण  स्थान है।  बात तब की है जब मैं  5 साल का था, वैसे  तो हर के जीवन में  कुछ  घटनाएं  विशेष  होती है  और याद भी रहती  है ऐसे  ही , मै अपनी  प्राथमिक  शिक्षा   जो कि  एक  सरकारी  स्कूल  से  पूर्ण  की गयी  है , का उल्लेख  सिर्फ  इसलिए  कर रहा हूँ  कि  ताकि आने वाली पीढ़ी को  यह समझ  आ सके कि  आप कहीं  पर भी रह कर अच्छी  शिक्षा  ले सकते हैं,  और  लोग यह इस बात को भी  महत्वपूर्ण  समझे  कि  सरकारी  स्कूल में  भी बहुत ही  अच्छी  तैयारी/पढाई  की जा सकती है  जैसे  लोगों का भ्रम  दूर  हो ।  उस समय   ( 1970 के बाद का समय   ) मे कोई  भी बच्चा  5 साल की उम्र  से पहले  स्कूल  नहीं  जाता  ग्रमीण  क्षेत्रो में ,  और शायद शहर में भी बहुत कम जाते रहे  होंगे  , ऐसा  मै मानता हूँ,  लेकिन  मै अपनी  बात कर रहा हूँ, जैसे  ही 5 वे साल में  प्रवेश  हुआ,  तो उसी समय  मेरा मुण्डन  संस्कार  भी हुआ  उसी दिन स्कूल  मे भी  माता  जी लेकर गयी, साथ में  पूरी  पकोड़े  जो कि घर में  बनाये गये  थे, गुरू जी  लोगों के लिए  लेकर भी गये, हैं  कितना उत्साह  था   वयां   नहीं  किया  जा सकता था। उस समय मिठाई का प्रचलन  कम था  या यू कहे कि था ही नहीं  ये भी हो सकता है  कि उस समय  आर्थिक  स्थिति  ठीक  नहीं रही होगी । मै  धीरे-धीरे  स्कूल  की गतिविधियों  को समझने  जैसे प्रार्थना,  मध्यवकाश छुट्टी के समय  पहाडे ,गिनती  आदि  बोलना   इन सबको बहुत धीरे धीरे  समझने  का अवसर  मिला। मुझे  अच्छी तरह याद है कि आरम्भ में    गुरु  2-3 सप्ताह  तक कोई काम  पढाई  आदि का नहीं  हुआ और न मुझे  दिया गया  क्योंकि  मै स्कूल  मे नया  था । उस समय  पाटी,(तख्ती)  रिगाल की  कलम,और कमेडा  की शीशी  लेकर अवश्य  जाते थै  साथ में  बैठने के लिए  एक विछौना (बोरी की),    उस समय शायद  मेरी उम्र  के अधिसंख्यक लोगों  की भी स्थिति  यही  रही  होगी  , आरम्भ  के 15 दिनों  तक तो खेलने  कूदने  के अलावा  कोई  काम नहीं था। अब धीरे-धीरे  गुरु  जी ने पाटी पर कुछ  आकृति  जैसे अ  आ   आदि  बनाकर   अभ्यास करने के लिए  दिया  और  ऐसे  ही लिखते रहने के लिए  कहा।  कितना  अच्छा  तरीका था तब तो इसके  आकलन  करने  की समझ नहीं थी पर आज लग रहा  है न भय  और खेल  खेल में,  सब कुछ  सिखाया जाता था  ,  लेकिन  कक्षा   4 व 5 की पिटाई  होते देख मन में  गुरु जी का डर तो लगा ही रहता  था। धीरे-धीरे  वराहखडी, गिनती, मात्राओं का  ज्ञान,  अक्षरों  को  मिला कर  शब्द  बनाना  आदि  ये  सब,  कक्षा 1  में  ही मुझे  6    से  12   माह के बाद  ये  सब आने  लगे  थे । उस समय  स्कूल  में  दो शिक्षक  थे ,और सबसे  महत्वपूर्ण  दोनों  शिक्षक  स्कूल में ही रहते  थे । उस समय  का स्कूल   डिजायन  भी मुझे  अच्छी  तरह याद है 2 छोटे -2  कमरे  व दो बढे कमरे  व एक बरामदा  होता था, और लगभग  सभी  स्कूलों  में  तत्समय  यही डिजायन  होता था। 2 छोटे  कमरों  में  से एक मे गुरु जी (दोनों  गुरु जी) की चारपाई  सोने के लिए  लगी  होती  थी, और दूसरे  कमरे  में गुरु  लोगों की रसोई  होती  थी। प्रत्येक दिन छुट्टी  से पहले  गुरु जी के लिए  पानी  की 2,3 बाल्टी  रख देते  थे,  ये सब  कक्षा  4 व 5 मे पढ  रहे  बच्चे  करते थे  । एक बात उस समय  जो सबसे  महत्वपूर्ण ,  मुझे  लगी  कि अभिभावको व छात्रों  में  अपने  गुरु के  प्रति  अगाध श्रद्धा  थी, श्रद्धा  इतनी  कि घर में  जो भी नयी  सब्जियां  लगे तो गुरु जी को अवश्य  ले जानी  है।  इसका  परिणाम यह होता था कि गुरु जी भी यह समझते थे कि मै अपने   शिष्यों  को कितना  पारंगत  बना  दू ,और उस रूप में  कार्य  करते  थे ,  और यही  बात शिक्षा  लेने  व देने में  महत्वपूर्ण  होती  है। स्कूल में  न तो कोई  शौचालय  और न पानी  की व्यवस्था  थी  ऐसा  नहीं है कि  मेरे  स्कूल  मे नही था अपितु  उस समय किसी  भी स्कूल  मे नहीं  होता था , लेकिन  कभी  कोई  शिकायत  नहीं  होती थी,  साफ सफाई  भी बारी बारी  से बड़े  बच्चे ही  करते थे  और खुशी से  करते  थे न तब कोई  शिकायत  होती थी,और सभी  प्रसन्न  रहते थे। एक बात और  महत्वपूर्ण यह है  कि उस समय  कक्षा  5 का बोर्ड  परीक्षा  होती थी और परीक्षा  से पूर्व  3,4 महीने   पहिले  से कक्षा  5 तैयारी के लिए  साय/रात को ही स्कूल  मे ही निवास करते  और गुरु जी रात को  10 बजे  तक पढाई  करवाते, जिसमें विषयों   जो कमजोर  होता तो  उसकी  पढाई  होती,  ये खुबसूरत  पल होता  था। मै कक्षा  1 से  कक्षा  4 तक ही इस सरकारी  स्कूल में  पढा फिर दूसरी सरकारी  स्कूल  से ही कक्षा  5 उत्तीर्ण  किया  और कक्षा  5 का बोर्ड  परीक्षा  प्राथमिक  पाठशाला  बरसीर  जखोली  रूदप्रयाग ( तत्समय  जनपद  टिहरी  गढ़वाल)  में  दी है। मेरा अनुभव  ये कहता है कि  यदि  कक्षा  5 तक आपकी बुनियाद  मजबूत  है, तो आपकी सफलताओं की राह आसान  हो जायेगी, और इस  ब्लाग  लिखने   का  मेरा   उद्देश्य भी   यही है  कि , सभी   अन्य  बच्चे /अभिभावक /शिक्षक आदि   प्रेरित  हो सकें। आज की सभी  स्कूलों में  लगभग  सभी  भौतिक  सुविधाएं  उपलब्ध हैं  ,सरकार  को सभी  प्राथमिक  स्कूलों  मे कम से कम 2 शिक्षक  की नियुक्ति  अनिवार्य  रूप से  करनी उचित  होगी।     चरेवेति चरेवेति। 

 

टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय श्री डी सी गौर जी द्वारा भ्रष्टाचार पर सटीक विश्लेषण किया गया गया है।आज पूरा देश भ्रष्टाचार के दल दल में फंस गया है।हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है इससे देश खोखला हो रहा है।जहां भी देखो भ्रष्टाचार दिखाई दे रहा है।सरकार को भ्रष्टाचार रोकने हेतु कठोर कदम उठाने चाहिए।भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर से कठोर सजा का प्राविधान होना चाहिए।

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