पढें कैसे ((How to read)
आज का ब्लॉग विशेषकर विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों के लिए विशेष उपयोगी हो सकता है । पढना एक कला है, यह कला बताती हैं कि हम क्यों पढ रहे हैं, कैसे पढ़ रहे हैं, कब पढ़ रहे, क्या पढ रहे हैं हम कैसे पढ़े कि हमको विषय की समझ पैदा हो सके और इसे हम ठीक - ठाक ढ़ंग से अभिव्यक्त एवं प्रतिपादित कर सकें। विद्यार्थी पढता है, तो उसे विषयों की समझ होनी चाहिए और शिक्षक पढ़ता है, तो उसे बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करना आना चाहिए, लेकिन पढना दोनों को ही पढता है। एक को अपनी आगामी परीक्षा में पास होने के लिए पढना है, और दूसरे (शिक्षक) को अपने विद्यार्थी को अच्छी तरह से समझाने के लिए पढना पढता है। इसमें एक खास बात यह है कि पढ़ने में भी पढाने वाले को रुचि पैदा हो, रूचि पैदा होती है जब विषय का उद्देश्य एवं औचित्य का ज्ञान हो।रूचिपूर्वक पढना तभी सम्भव होता है जब हमें उस विषय का उद्देश्य का पता हो कि आखिर हम इसे पढ़ क्यो रहे हैं,? पढा क्यों रहे हैं, और उस विषय का हमारे जीवन से क्या संबध है? जब तक हमको यह बात पता नहीं होती कि हम पढ क्यों रहे हैं? या जितना हम पढ रहे हैं उससे हमारा उद्देश्य प्राप्त हो रहा है या नहीं , इसकी हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है तब तक हम सब उस विषय को मात्र ढो रहे हैं, मेरा अनुभव तो ये है कि कई बार तो जिस कक्षा में आप /हम पढ रहे होते हैं , उसका पाठ्यक्रम भी आपको मालूम नहीं होता है इसे आप अपने आस-पास पढने वालों से भी पता कर सकते हैं, के ये बात कितनी सत्य है ? ठीक इसके विपरीत जब हमें अपने विषय के लाभ व उपयोगिता की जानकारी होती है तो हमारी रूचि स्वतः पैदा हो जाती है और हम सभी उस कार्य को बहुत ध्यान से करने लगते हैं । जब हम पढते हैं, तो हमें अपनी अपनी क्षमताओं का ज्ञान होना भी अति आवश्यक है, कि हमारी आंतरिक क्षमता कितनी है? हम कितना सीख सकते हैं?हम कितना अभिव्यक्त कर सकते हैं? हम कितना याद रख सकते हैं? उदाहरण के लिए मेरी समझ इतनी नहीं है कि मैं गणित समझ सकूँ, इसके बाद भी गणित की पढ़ाई कर रहा हूँ तो यह विषय हमें नहीं आयेगा ,हमे जितनी मानसिक ऊर्जा को इसमें लगाना पडेगा उतनी हम नहीं लगा सकते हैं यदि हम इसमें मानसिक शक्ति नहीं लगायेंगे तो इसे हम सीख नहीं पायेंगे, हम केवल गणित की किताब लेकर बैठे रहेंगे और कुछ समझ नहीं आयेगा। विषय की समझ पैदा करने के लिए आवश्यक है कि हमारी मनोदशा उस विषय के साथ संबधित हो जाय और जैसे जैसे यह संबंध सूत्र जुड़ने लगता है तो विषय की समझ पैदा होने लगती है, फिर हम विषय की गहराई के साथ-साथ उसके विस्तार को जानने लगते हैं और हमारी सीखने की क्षमता भी विकसित होती जाती है, और मुझे लगता है यह हर क्षेत्र में ही होता है । आप सभी पाठकों का भी इसमें अपना अपना अनुभव होगा। सीखने की क्षमता विकसित हो जाने पर हम अपरिचित विषय के साथ भी गहरा तारतम्य जोड़ सकते हैं यह कला आ जाने पर हम अनेक नये विषयों को एक साथ संबधित कर समझने लगते हैं। इससे हमारा बौद्धिक विकास होता चला जाता है, फिर उसे याद नहीं करना पढता है याद तो तब करना पढता है जब विषय समझ नहीं आता, समझ आ जाये तो विषय स्वतः ही स्मृति पटल पर अंकित हो जाता है, इसलिए उपनिषद कहता है, कि विषय की बेहतर समझ पैदा करो,उसे याद नहीं करो।चरैवेति चरैवेति।
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