ऐसे तो नहीं मिटेगा भ्रष्टाचार (corruption will not end this way)


 इस  समय  समाज   मे    जो  सबसे  बड़ी  समस्या  है,  वह है भ्रष्टाचार(corruption) और ऐसा  नहीं  है एक जगह  पर  है ,  हो सकता है  कुछ अपवाद  हो  कि  वहाँ  पर  न हो ,  लगभग हर जगह, पर विद्यमान दिखायी  देता  है , दूसरा अपना  काम  समय से न करना, या  लापरवाही से करना  वह भी एक प्रकार का भ्रष्टाचार  की श्रेणी  में  माना  जा सकता  है। आये दिन मीडिया   व समाचार  पत्रों  मे आप/  हम  सभी  को  सुनने  व देखने  को मिल जाता है  कि  अमुक व्यक्ति    रिश्वत  लेते  पकडा गया है, या अमुक   व्यक्ति  के    घर पर    लाखो- करोड़ रूपये    छापे  में  पकड़े  गये,  जो  कि प्रगतिशील  राष्ट्र  के लिए   कतई  ठीक  नहीं  कहा जा सकता  है  । भारत  तेजी से  हर क्षेत्र में  अपनी  पहचान विश्व  भर में  बना  रहा,    इसलिए आशा की जाती है  बहुत  जल्दी  ही भारत महाशक्ति आर्थिक  रूप  से भी  बनता  दिखाईं  दे  , लेकिन   विभिन्न  क्षेत्रों  में  व्याप्त   भ्रष्टाचार    भारत  को  कमजोर  कर रहा है  । न्यूनतम  मजदूरी  होने के कारण  श्रम भारत में  सस्ता  है।  बहु  राष्टीय कम्पनिया भी यहाँ  फल फ़ूल  रही है। भारतवासी  मेहनती, स्वावलंबी हैं, पर गरीबी, असमानता, भ्रष्टाचार  के हावी  होने  से क्या  यह सपना  साकार  हो सकेगा, कुछ कहा नहीं  जा सकता है। वह रिश्वत  देकर  ही सारे काम  कराता है। भ्रष्टाचार एक सामाजिक  कलंक  है।क्या कारण  है कि आज यह एक स्टेटस  सिबल  बन गया है ।भ्रष्ट  व्यक्ति  अब सिर  उठाकर  चलता है, पीछे  लोग  सिर  झुकाकर  चलते हैं। आर्थिक  महाशक्ति  बनने वाले  भारतवासी  क्या इस  भ्रष्टाचार  रूपी घुन को नहीं  देख पा रहे हैं, जो धीरे-धीरे  राष्ट्र  को खोखला  करता  जा रहा है। ऐसा  लग रहा है  कि भ्रष्टाचार   को सामाजिक  तौर पर स्वीकार कर लिया गया है । जितना  धनी, वह उतना ही  सम्मान का पात्र ,यह धारणा  जो पिछले  दो दशकों  मे बन गयी है,  यह किसी  भी दशा   उचित  नहीं  कही  जा सकती है । हम कितना  ही  चिल्लाते  रहे  कि काला  धन वापस लाओ,मगर यह अभियान  तब तक पूरा  नहीं  हो सकता है , जब तक तंत्र में  मजबूत  इच्छाशक्ति  न हो,  भारत  में  भ्रष्टाचार  कई जटिल कारणों  से भी है, जिनमें  सरकारी    प्रकियाओ  में  पारदर्शिता की कमी  , कमजोर कानूनी  संस्थाये, लम्बी  और जटिल   नौकरशाही   प्रकिया,  और सबसे महत्वपूर्ण  राजनीतिक  हस्तक्षेप  प्रमुख है।इसके  अलावा  कम वेतन, नैतिकता  में  भारी  गिरावट,   भी प्रमुख  कारणों  मे सम्मिलित  है ,जिसे लोग  अपने  फायदे  के लिए  भ्रष्ट  आचरण  में  सम्मिलित  हो जाते हैं  या प्रोत्साहित  होते हैं।  जब तक हमारे  व्यवस्था  तंत्र  की सोच  व दी जाने  वाली  शिक्षा  में  परिवर्तन व दृढ़  इच्छा शक्ति  नहीं  होगी, जब तक जन जन नहीं  जागेगा, हर व्यक्ति  राष्ट्र  हित  में  नहीं  सोचेगा ( अर्थात  सभी  को अपने अपने  स्तर  पर सोचना  होगा ) तब तक यह सम्भव  भी नहीं  लगता। यह आसानी  से अनुमान  लगाया  जा सकता है कि  एक  नियमित  वेतनभोगी या कोई और व्यवसायी   यदि   अपनी  आय से   अधिक  सम्पत्ति  का मालिक  है तो कैसे  सम्भव हो सकता है या तो उसके पास पैतृक हो या कोई  अन्य कारण  या फिर  गलत तरीके से धनार्जन , कोई  न कोई  बात अवश्य  होगी। समाज  में  1991 मे  आये बदलाव  के बाद पैसा कमाने की, विलासिता  भरा  जीवन जीने  की एक होड  मची है। परिश्रम, वेतन व्यापार, कृषि  से तो इतना  पैसा  नहीं  आ सकता है, उसके  लिए  शार्टकट  अपनाया गया  और लोग  देखते  देखते  धनाढ्य  बनते  चले गये। शासन  में  रहकर  नीली  बत्ती, लाल  बत्ती  की गाड़ी  में  घूमकर अधिक  शानदार  जिदंगी  जी  जा सकती है ,यह मान्यता समाज  में   बढ़ी है, प्रशासकीय  अधिकारीयो  द्वारा  भ्रष्टाचार   के मामले  तेजी  से बढ़े  हैं, कुछ  लाख  नहीं, अपितु  करोड़ों  के भ्रष्टाचार  इनके नाम  पर है कई के खिलाफ  आरोप पत्र  बने हैं, मुकदमे  चले,आगे नहीं बढ़े ।  शासन के अधिकारी  के खिलाफ  शासकीय  एजेंसी  कैसे  काम करेगी,  सैयां ही कोतवाल  हो तो फिर डर किसका  । भ्रष्टाचारी,  भ्रष्टाचार  की कमाई  खा रहे हैं,  एवं  सबको  अंगूठा  दिखा  रहे हैं। एक दो घोटालों  में  कुछ  राज नेताओं  को कैद करने  से  कुछ  नहीं  होगा, उस कुए को ढूंढना  होगा  जहाँ  के पानी  में   मिली  भांग  पीकर  हर नशेडी  भ्रष्टाचार के  दंगल में कूद जाता है।महत्वपूर्ण  यह है कि हर व्यक्ति  इसे अपनी  जिम्मेदारी     नहीं  मानता है  ।  जब तक हम बदलने  को तैयार  नहीं  होंगे, व्यवस्था  ऐसे  ही चलती  रहेगी  और बदतर होती  चली जायेगी। राजनीतिक तंत्र  से अधिक  अपेक्षा  रखने  के बजाय  अब जन जागरूकता आत्मसुधार की ओर मोड़ी  जानी उचित  रहेगी,  जब हम  सभी  स्व का मूल्यांकन  अर्थ  से नहीं, निजधर्म  के पावन से करने  लगेंगे  तो फिर अर्थ  को महत्व  नहीं  मिलेगा। इसके लिए  विश्व  के सबसे  बड़े  लोकतंत्र  को अगले  पांच  वर्षों  में  कड़ी  परीक्षा की  कसौटी  से गुजरना  होगा। मात्र  एक जन लोकपाल  बन जाने  से काला धन वापस आ जाने  से करेंसी  का स्वरूप  बदल जाने  से यह परिवर्तन  नहीं  आयेगा।     यह परिवर्तन आयेगा  तो   हमारी   मानसिकता  में  परिवर्तन  से ही  ,जब स्थान स्थान   पर खर्चीले  आयोजन  पर रोक  लग पायेगी,  तो धीरे-धीरे   परिवर्तन  सम्भव होगा।  इसके  लिए  सभी  को साथ  आना  होगा  और जिस स्थान  पर हैं  उसमे   सुधार  करना  होगा  ।   राष्ट्रीय  हित  में  सभी  को योगदान  देना ही  होगा ।  चरैवेति चरैवेति। 


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