धार्मिक साहित्य (Religious Literature सामान्य-11)
जीवन के सर्वागीण विकास में सहायक समस्त साधनों का सामूहिक नाम धर्म था,यह एक जीवन प्रणाली थी,जिसके द्वारा मानव जीवन नियंत्रित एवं संचालित होता था। धर्म के इस सर्व व्यापी महत्व के कारण प्रचुर मात्रा में विभिन्न धार्मिक ग्रन्थ लिखे गये। इन धार्मिक ग्रन्थों में धार्मिक इतिहास के साथ-साथ राजनितिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सास्कृतिक पहलुओं की भी झलक मिलती है।प्राचीन काल में भारत में ब्राहमण, बौद्ध, एवं जैन इन तीन धर्मो की प्रधानता थी,अतः इनके धर्म ग्रन्थ भी अपनी अपनी विशेषताओं के साथ तीन वर्गो में विभक्त है । 1-ब्राह्मण धर्म ग्रन्थ, 2-बौद्ध धर्म ग्रन्थ 3-जैन धर्म ग्रन्थ। ब्राह्मण धर्म ग्रन्थों में वेद का स्थान सर्वोपरि था। वेद का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान। आर्य जाति का प्राचीन ज्ञान इन्ही वेदों में सुरक्षित है और उसका परवर्ती ज्ञान इन्हीं पर आधारित है। वेद चार हैं ॠगवेद,सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद। ॠगवेद सबसे प्राचीन है।इसमें आर्यों के भारत के पूर्व की तथा भारत में आने की जानकारी मिलती है। सामवेद उस वेद का नाम है,जिसमें मंत्र यज्ञों में देवताओं की स्तुति के समय मधुर स्वर में गाये जाते हैं। यजुर्वेद, यज्ञ प्रधान वेद है,जिसमें आर्यों की यज्ञ विधियों की जानकारी मिलती है। चारों वेदों में अथर्ववेद सबसे बाद का है,इसमें ब्रह्मज्ञान, धर्म, समाज-निष्ठा, औषधि-प्रयोग, रोग निवारण, तंत्र मंत्र, टोना-टोटका, मारण, मोहन आदि अनेक प्रकार की जानकारी मिलती है। समय के साथ-साथ आर्यों में यज्ञ एवं कर्मकाण्ड में वृद्धि होती गयी और इनका विधान भी जटिल हो गया, अतः इन्हे बोधगम्य बनाने के लिए तथा इनमें दार्शनिकता का रहस्योद्घाटन करने के लिए ब्राह्मण ग्रन्थ की रचना हुई। अर्थात यज्ञ के विषयों का प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थ ब्राह्मण कहलाये। ये वेदों पर आधारित हैं। प्रत्येक वेद के पृथक पृथक ग्रन्थ हैं। ॠगवेद का ऐतरेय, और कौषितकी ब्राहमण, यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण, सामवेद का पंचविश ब्राह्मण और अथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण। इन सब में तत्कालीन सामाजिक दशा का उल्लेख मिलता है। ब्राह्मण धर्म ग्रन्थों के बाद आरण्यक ग्रंथों का स्थान है। ये ग्रन्थ वनों की एकान्तता में पढ़ जाते थे, इनमें चिन्त शील ज्ञान पक्ष पर जोर दिया गया है, वस्तुतः ज्ञानमार्गी विचारधारा का बीजारोपण इन्हीं ग्रन्थों में दृष्टिगोचर होता है, इनकी संख्या सात बतायी गयी है।आरण्यक के बाद, उपनिषदों की रचना की गयी। इन ग्रन्थों में ब्रह्म ज्ञान अथवा आत्म ज्ञान की विषाद चर्चा है।यज्ञों के स्थान पर ज्ञान मार्ग का और बहुदेववाद के स्थान पर एक परम सत्ता का प्रतिपादन किया गया है।उपनिषद ग्रन्थ किसी एक लेखक अथवा एक काल की रचना नहीं है अपितु भिन्न भिन्न समय में अनेक विद्वानों एवं विचारकों के बौद्धिक योगदान का परिणाम है। प्रमुख उपनिषदों के नाम इस प्रकार हैं--केन,कठिन, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर,छान्दोग्य, बृहदारण्यक और कौषितकी। इस शुद्ध धार्मिक साहित्य में भी तत्कालीन समाज स्वतः प्रतिबिम्बत हो उठा है।वेदांग छ है,शिक्षा (स्वरशास्त्र),कल्प (कर्मकाण्ड), व्याकरण, निरुक्त (शब्द व्युत्पत्ति विद्या),छन्द एवं ज्योतिष, ये सब वेदों के अंग समझे जाते हैं और वेदों को ठीक से समझने के लिए शुद्ध उच्चारण करने एवं यज्ञों के विधान को समझने में सहायक हैं। सूत्रग्रन्थो का सम्बन्ध कर्मकाण्ड से सम्बन्ध होने के कारण ब्राह्मण एवं आरण्यक ग्रन्थों से सीधा सम्बन्ध है,इसकी संख्या तीन है-श्रोत सूत्र, गुह्य सूत्र और धर्म सूत्र इसके साथ-साथ ब्राह्मण धर्म ग्रन्थों में स्मृति साहित्य, महाकाव्य, व 18 पुराणों का भी उल्लेख मिलता है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हम अपनी किसी भी आने वाली पीढ़ी को इन सबके बारे में परिचय कराते हैं। इस पर हम सभी को चिन्तन और मनन करना चाहिए यह तभी स्थान्तरित होगा जब हम सभी इस पर सोचे और अन्य को प्रेरित करें ।चरैवेति चरैवेति।
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