ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical सामान्य-10)

     


 आज का ब्लॉग  विशेषकर  उन लोगों  या  छात्रों   के लिए  लाभदायक होगा  जो किसी  प्रतियोगी  परीक्षा में  बैठ  रहे हैं,  या उनका   परीक्षा  की तैयारी    करने  का मन  है,  आशा  करता हूँ  कि आपको  अच्छा  लगेगा  ।  भारत में  ब्रिटिश  1600 ई0 में  ईस्ट इंडिया कंपनी  के रूप में, व्यापार  करने  के लिए  आये थे। महारानी  एलिज़ाबेथ  प्रथम  के चार्टर  द्वारा  उन्हें  भारत में  व्यापार  करने  के लिए  विस्तृत  अधिकार  दिये गये थे। कंपनी  जिसके  कार्य  अभी तक सिर्फ  व्यापार  के कार्यों तक ही सीमित  था, ने 1765  ई में  बंगाल, बिहार  और  उड़ीसा  के दीवानी अधिकार  भी प्राप्त कर लिए। इसके  तहत  भारत में  उसके  क्षेत्रीय  शक्ति  बनने की  प्रक्रिया  आरम्भ  हो  गयी।1858 में  सिपाही  विद्रोह  के परिणाम स्वरूप  ब्रिटिश  ताज (crown) ने भारत के  शासन  का उत्तरदायित्व  प्रत्यक्ष  रूप से  अपने  हाथों में  ले लिया। यह शासन  15 अगस्त 1947  में  स्वतंत्रता  प्राप्ति  तक अनवरत  रूप  से जारी  रहा।स्वतन्त्रता  मिलने के साथ  ही भारत  में  एक संविधान  की आवश्यकता  महसूस  हुई। 1934 में एम में  एम एन राय  ( भारत में  साम्यवाद आदोलन  के प्रणेता  और आमूल  परिवर्तनवादी  प्रजातंत्रवाद के समर्थक) के दिये  गये  सुझाव  को अमल में  लाने  के उद्देश्य  से 1946 में  एक संविधान  सभा  का गठन  किया गया  और 26 जनवरी  1950 को संविधान  अस्तित्व में  आया। यद्यपि  संविधान  और राजव्यवस्था  की अनेक  विशेषताएं  ब्रिटिश  शासन से ग्रहण  की गयी थी,, तथापि  कुछ  घटनाएं  ऐसी  थी,जिनके  कारण  ब्रिटिश  शासित  भारत में   सरकार  और प्रशासन  की विधिक  रूपरेखा  निर्मित की गई।इन घटनाओं  ने हमारे  संविधान  और राजतंत्र  पर गहरा  प्रभाव  छोड़ा। कंपनी का शासन(1773-1858) 1773 का रेगुलेटिग एक्ट-इस अधिनियम  का  अत्यधिक  संवैधानिक महत्व है यथा  एक-भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के  कार्यों  को नियमित  और  नियंत्रित  करने की   दिशा में  ब्रिटिश  सरकार  द्वारा  उठाया गया  यह पहला  कदम था। दूसरा-इसके  द्वारा  पहली  बार  कंपनी  के प्रशासनिक  और राजनैतिक  कार्यो  को मान्यता  मिली,  तीसरा -इसके  द्वारा  भारत में  केन्द्रीय  प्रशासन की  नीव रखी गयी। इस अधिनियम के  द्वारा  बंगाल  के गवर्नर को बंगाल  का गवर्नर  जनरल पद  नाम  दिय  गया एवं  उसकी  सहायता  के लिए  एक चार सदस्यीय  कार्यकारी  परिषद  का गठन किया गया। ऐसे  पहले  गवर्नर  जनरल  लार्ड  वारेन हेस्टिंग्स  थे। इसके  द्वारा  मद्रास  एवं  बम्बई  के गवर्नर,  बंगाल  के गवर्नर के अधीन  हो गये,जबकि  पहले  सभी प्रेसिडेंसीयो  के गवर्नर  एक दूसरे से  अलग  थे। अधिनियम के  अन्तर्गत  कलकत्ता  में 1774 में  एक उच्चतम न्यायालय  की स्थापना की  गयी, जिसमें एक  मुख्य  न्यायाधीश और 3 अन्य न्यायाधीश  थे।इसके  तहत कंपनी  के कर्मचारीगण  को निजी  व्यापार  करने  और भारतीय  लोगों  से उपहार  और रिश्वत  लेना प्रतिबंधित  कर दिया गया। इस अधिनियम के द्वारा  ब्रिटिश  सरकार  का कोर्स आफ डायरेक्टर्स  के माध्यम से  कंपनी  पर नियंत्रण  सशक्त  हो गया। इसे भारत  में  इसके  राजस्व, नागरिक  और सैन्य  मामलों की जानकारी  ब्रिटिश  सरकार  को देना  आवश्यक कर दिया  गया।  चरेवेति चरेवेति। 

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