उत्तराखंड में आपदा (Disaster in Uttrakhand)
वैसे तो आपदा कही पर व किसी भी समय और कैसी भी आ सकती है परन्तु आपदा के बारे में यह कहा जा सकता है, कि आपदा एक ऐसी स्थिति है जो अचानक या अप्रत्याशित रूप से उत्पन्न होती है और जिसमें बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि होने की संभावना होती है। आपदाएं प्राकृतिक या मानव-निर्मित हो सकती हैं। मोटे तौर पर भूकम्प, बाढ,चक्रवात, सूखा, बादल फटना, औद्योगिक दुर्घटना, परिवहन दुर्घटना, आतंकवादी घटनाये आदि होती रहती हैं। उत्तराखंड में विगत कुछ समय से बादल फटने की अप्रत्याशित घटनाओं मे बृधि हो रही है, चाहे वह उत्तरकाशी मे धराली की घटना हो,चमोली में थराली व नन्दा नगर की घटना हो और चाहे वह देहरादून के सहस्त्रधारा की घटना के साथ साथ राज्य के अन्य हिस्सों में भी हो , और हिमाचल व अन्य राज्यों में नुकसान हुआ हो, सभी में बादल फटने से व अत्यधिक बारिश से बहुत भारी नुकसान हुआ है। जिसमें समान्य जन जीवन अस्त व्यस्त हुआ है, अत्यधिक वर्षा के कारण यातायत , विद्युत , पेयजल,संचार सुविधाओं, आदि लाइनों को भी भारी नुकसान हुआ है , जिसमें जन हानि मी प्रमुख हैं । उत्तराखंड और अन्य पर्वतीय राज्यों की भौगोलिक बनावट को देखा जाय तो ऐसी है कि , यह बादल फटने के बाद उस पानी के वेग तीव्र कर देता है और साथ में उसके मिटटी और कंकड़ मिलकर उसके प्रवाह को और भी तीव्र कर देता है जो अधिक वेग के कारण , बहुत ही नुकसान कर देता है । अब यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, क्या हम इस आपदा को रोक सकते हैं और यदि रोक नहीं सकते तो इसका प्रभाव कम किया जा सकता है। प्रकृति जन्य आपदा को रोका नहीं जा सकता है और कोई भी नहीं रोक सकता है, यह सत्य है,परन्तु इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके लिए सभी को साथ आना होगा, जिसमें सरकार का महत्वपूर्ण योगदान होगा। उदाहरण के लिए विकास के नाम बहुत सारे जंगलों का सफाया कर दिया गया, बड़े बड़े बांधो का निर्माण, बड़ी इमारतों को बनाने के लिए जमीन का समतलीकरण, सबसे महत्वपूर्ण जो पानी के निकास के रास्ते नाले, नदी के रास्ते हैं अन पर अनाधिकृत कब्जा कर नव निर्माण कर दिया गया, जो कि किसी भी दशा में उचित नहीं कहा जा सकता, सरकारों ने भी इस पर को कोई ठोस नीति नहीं बनायी, जिसको भी जहाँ मौका मिला, नदी, नाले खाले कब्जा कर अनियमित निर्माण कर दिया गया, जिसका परिणाम जब बादल फटने के बाद नदी ने अपना रास्ता ले लिया जबकि इस पर काफी बड़ी बस्ती जो कि इस समय वहां पर थी, नुकसान हो गया। इसमें सरकार को भविष्य की एक सख्त रणनीति बनानी होगी कि नदी, या नालों के रास्ते पर कोई भी अतिक्रमण की अनुमति नहीं होगी व पर्वतीय क्षेत्रों के लिए भी एक नीति भवन निर्माण की बनायी जानी उचित होगी। सरकार द्वारा बनायी गयी नीति को समर्थन करना हम सब की नैतिक जिम्मेदारी भी होनी चाहिये। इसलिए हम आपदा को रोक तो नहीं सकते हैं पर इसके प्रभाव को ठोस नीति बनाकर , निश्चित ही कम किया जा सकता है। इस पर सभी को सोचना होगा। चरैवेति चरैवेति।
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