ज्योतिष (Astrology)-2
यदि आप किसी की या स्वयं की जन्म पत्रिका देख रहे हैं तो आपको ये सामान्य जानकारी होनी आवश्यक है। इसमें 12 खाने बने होते हैं जिसे कि हम 12 भाव कहते हैं और यह प्रथम भाव से 12 भाव ( first house to 12 house) के नाम से जानते हैं। इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक कुंडली के लिए भाव सब एक से ही रहते हैं, उसमें बैठे ग्रह अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु भाव का क्रम सबके लिए एक जैसा निशित है। उदाहरण के लिए प्रथम भाव को सभी के लिए लग्न ही कहा जाता है। प्रथम भाव में कौन सा अंक है 1 से 12 अंक में से, उदाहरण के लिए प्रथम भाव में 1 है तो हुआ मेष लग्न 5 का अंक है तो सिंह लग्न और ,12 का अक है तो हुआ मीन लग्न इसी प्रकार से अन्य भी कह सकते हैं ।अपने पूर्व ब्लॉग दिनांक 27 July 25 को सामान्य जानकारी के लिए पढ सकते हैं जिससे ये जल्दी में समझ आ जाय। एक लग्न होता है दूसरा आपने सुना होगा कि आपकी राशि क्या है, कई लोग एक दूसरे को पूछते हैं इसका भी एक नियम है जिस भाव में चन्द्रमा (,moon) होता है और उसमें जो अंक 1 से 12 तक हैं उस अंक की राशि ही राशि कहलाती हैं । उदाहरण के लिए चन्द्रमा 4 के अंक में है तो राशि हुई कर्क राशि, यदि चन्द्रमा 2 के अंक में है तो राशि हुई बृष राशि। अब एक बात समझनी होगी कि कौन ग्रह किस घर या किस अंक या किस भाव में बैठे हैं यह जातक के जन्म समय पर निर्भर करता है और समय का ध्यान अवश्य रखना चाहिए और सही से रखना चाहिए। अब एक महत्वपूर्ण बात ये है कि 12 भाव है और उनमें कौन से ग्रह बैठे हैं और फिर उनके मालिक (owner) कौन हैं और कहाँ बैठे हैं, या उसके साथ अन्य कौन से ग्रह बैठे हैं ? उस ग्रह का अपना घर कौन सा है ? उसकी मित्र राशि या शत्रु राशि कौन सी है ? कब कोई ग्रह उच्च या नीच कहलाता है और उसका प्रभाव क्या होता है ? आदि ये सब फलित में जानेगे इसके लिए समय-समय पर इस ब्लॉग को देख सकते है, इन सभी विन्दुओं पर समय-समय पर बारी बारी से उदाहरण से समझा जा सकता है, और यदि आपकी कुणडली में ऐसे ग्रह बैठे है तो स्वयं अपना विशलेषण आकलन कर सकते हैं। कुंडली में पहला भाव, जिसे वैदिक ज्योतिष में तनु भव / लग्न स्थली के रूप में भी जाना जाता है, आमतौर पर स्व भाव के रूप में जाना जाता है। यह हमारी आंतरिक व बाहरी छवि को नियंत्रित करता है जिसे हम दूसरों को चित्रित करते हैं। भाव हमारी शारीरिक उपस्थिति, सामान्य व्यक्तित्व लक्षण, स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा, बचपन, और हमारे जीवन के प्रारंभिक बचपन पर भी शासन करता है। इसलिए, प्रथम भाव को वैदिक ज्योतिष में स्व-भाव के रूप में वर्णित किया गया है। वैदिक ज्योतिष में आम तौर पर प्रथम भाव को लग्न के रूप में जाना जाता है। पहला भाव ज्योतिष के मुताबिक अन्य भावों को भी प्रभावित करता है। यह सभी घरों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह जीवन की शुरुआत का प्रतीक है। यह नई शुरुआत और हमारे जीवन में आने वाले शुरुआती परिवेश को संदर्भित करता है। जैसा कि इसे तनु भव के रूप में भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है शरीर का घर, पहला घर हमारे व्यक्तित्व, शारीरिक विशेषताओं, शक्ति, रूप और यौन अपील का संकेतक है। यह भाव हर समय हमें आकार देने का काम करता है। यह घर उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो हम बन रहे हैं और बनेंगे, हमारे आत्म और बाहर दोनों से। यह दुनिया के लिए हमारे व्यक्तित्व और प्रस्तुति को नियंत्रित करता है, जीवन, दृष्टिकोण, आवश्यक क्षमताओं और बुनियादी संवेदनाओं के लिए दृष्टिकोण देता है। इस भाव से शरीर, यश चरित्र, शक्ति, साहस, आवास , जन्म स्थान, मान सम्मान,वंश, आजीविका, धन, सुख दुःख, वैराग्य, माता पिता का समावेश आदि के लिए जाना जा सकता है । चरैवेति चरैवेति ।
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