मनोबल (Morale)
संसार में अनेकों परस्पर विरोधी प्रचलनो की भरमार है, यह एक विडम्बना ही है कि हम अपना महत्व न समझ कर दूसरे के अधीन परावलम्बी बन जाते हैं उनमें से किसी को हम स्वीकार कर लेते हैं, उसमें उन प्रतिपादनो की नहीं, हमारी चयन बुद्धि, वातावरण एवं पूर्वाग्रह के आधार पर बनी हुई हमारी अभिरूचि को ही श्रेय जाता है। अस्तु प्रधानता प्रतिपादन की नहीं है अपितु अपनी अभिरूचि या विचार क्षमता की ही रही। यदि उस वातावरण से अपना सम्बन्ध उतना घनिष्ठ न होता तो वातावरण का प्रभाव हमारे मानस पटल की दूसरी स्थिति भी बना सकता था। तब कदाचित् हम उस भिन्न प्रचलन के अनुयायी रहे होते, किन्तु देखा गया है कि हमारी मान्यताओ और अनुभूतियों में अन्तर आ जाने पर फिर वैसी स्थिति नहीं रहती और मित्रता घटकर उपेक्षा में कभी-कभी शत्रुता में भी परिणत हो ज़ाती है। यह ठीक है कि साधारण स्तर के लोगों को वातावरण बनाता और ढालता है,पर यह कथन उन्ही के लिए सही बैठता, जिनकी मानसिक स्थिति कमजोर होती है, मजबूत मानसिक स्थिति वाले लोगों पर वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वे वातावरण को ही अपनी स्थिति के अनुसार बनाने की सामर्थ्य रखते हैं । कुसंग और सत्संग हर किसी को अपनी विशेषता से प्रभावित नहीं कर सकता है। कई बार तो देखा गया है कि दुष्ट भी उत्कृट प्रतिभाओं के सम्पर्क में आकर सुधर जातें हैं और सज्जन बन जाते हैं। यह दो मनोबलो की लड़ाई है जो प्रबल होता है वह दूसरे को परास्त कर देता है ऐसा आप भी अनुभव करते होंगे ये दैनिक जीवन में भी बहुत बार आस पास देखा जा सकता है। जहाँ किसी एक को व्यक्तित्व की बरिष्टता स्वीकार करनी पड़ती है । आज जैसी भी कुछ स्थिति है, वह सब हमारी मानसिक स्थिति का ही परिणाम है। मन कर्ता है।संसार की सम्पूर्ण वाह्य रचना की शक्ति और आधार मन है हमारा आहार, रहन-सहन, चाल- चलन,व्यवहार विचार, शिक्षा समून्नति यह सब हमारी मानसिक दशा के अनुरूप होती है जैसा कुछ चिन्तन करते हैं, वैसे विचार बनते हैं, वैसे ही क्रिया - कलाप भी होते हैं । कहा जाता है कि चिकित्सा से व्यक्ति रोगमुक्त होते हैं पर यह बात उसी हालत में सत्य है, जबकि रोगी का विश्वास चिकित्सक एवं चिकित्सा पद्धति पर बना रहता है। यदि वह डगमगाने लगे तो उपचार का प्रभाव आधा रह जाता है। सच तो ये है कि विघ्न- बाधाये मानव की परीक्षा लेने के लिए आती है, व्यक्तित्व भी अधिक प्रखर परिपक्व विपरीत परिस्थितियों में ही बनता है , अभाव,अवरोध, कठिनाइयां वस्तुतः अभिशाप उनके लिए है जो परिस्थितियों को ही सफलता, असफलता का कारण मानते हैं, अन्यथा आत्मविश्वास एवं लगन के धनी ध्येय के प्रति दृढ़ व्यक्तियों के लिए तो वे वरदान सिद्धि होती है, भट्टी में तपने के बाद ही सोने में निखार आता है ,गिने चुने अपवादों को छोड़कर विश्व के अधिकांश महापुरुषों का जीवन चरित्र पढने पर यह पता चलता है कि वे अभावगस्त परिस्थितियों में पैदा हुए, पले हैं , और अपने पुरुषार्थ के बल पर उन्होंने असाधारण कार्य किये है। ये लोग हमारे भी प्रेरणा स्रोत हैं। चरेवेति चरेवेति।
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