ईर्ष्या (Jealous )

     


 किसी भी  व्यक्ति  या मनुष्य  में  ईर्ष्या की भावना एक बहुत  बड़ी  विकृति है, जो कि एक गहरी टीस की तरह अंदर ही अंदर  व्यक्ति को पीड़ित करती रहती है  और  खोखला  करती हैं ।यह एक ऐसे  दर्दनाक  दलदल है, जो अपने  में  कितनों को  डुबोए रहता है, और आसपास के  वातावरण  को इस दुर्गंध से प्रदूषित  करती  रहती है। ईर्ष्या की गहरी  पीड़ा  सभी  प्रकार  की सुख शांति, चैन खुशी  को हरण कर लेती है  और बदले में  जलन,कुढन प्रदान करती  रहती है ।यह हमे आत्मविमुख  करती है और  पतन पराभव की अंधेरी  सुरंग में  धकेल देती है  जिससे  बाहर निकलने का  कोई  रास्ता दिखाई नहीं  देता है। आखिर ईर्ष्या  पैदा क्यो  होती है  ? आप सभी  पाठकों  का भी इसमें  अपना अपना  अनुभव  होगा, कि  इसके  पीछे का  क्या  मनोविज्ञान  है ?यह एक रोचक तथ्य है ,जिसके  जबाब इस तरह से दिया ज सकता है कि हम जिससे  ईर्ष्या करते हैं  उसके  जैसा  बनना  चाहते हैं  और यदि  वैसा नहीं  बन सकते हैं तो उसकी अतृप्ति  से हम  ईर्ष्यान्वित  हो जाते हैं। उस व्यक्ति  की विशिष्टता  को सम्मान  नहीं  दे पाते  जो हमारे   अंदर  नहीं है। आमने सामने  तो कटु  आलोचना  करते हैं, और अपने  तमाम  कुतर्को से  हम यह प्रयास करते हैं कि वह कितना  अयोग्य  है, यहाँ तक की उसकी  अयोग्यता  पर अर्थहीन  लंबा-चौड़ा  व्याख्यान  दे देते हैं , जबकि  हम स्वयं वैसा  बनना  चाहते हैं, और न बनने  की  स्थिति  में  ईर्ष्या   से ग्रसित  रहते हैं। इसी  पीड़ा  और व्यथा  की भूमि  में  ईर्ष्या  फूलती और फलती है। ईर्ष्या की भावदशा का प्ररारम्भ  निंदा का अंतहीन  सिलसिला  चलता है, जिससे  हम ईर्ष्या करते हैं,  हम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष  रूप से उसकी  निंदा  करने  से नहीं  चूकते हैं  और साथ में  ये भी चाहते हैं  कि  और लोग उसकी  घोर उपेक्षा  करें, उसे  परेशान, प्रताड़ित  करे,और जब कभी-कभी  ऐसा  होता है, तो हमें  अजीब  सी खुशी  मिलती है, यह खुशी स्थायी  नहीं  होती हैं, और न अपने  लिए  ही  होती है, यह दूसरों  के भावनात्मक  चोट की चुभन से सनी हुई  रहती है। पर पीड़ा  में  हमें  दुखी होना चाहिए  ये अच्छी  बात है , परन्तु  ईर्ष्या की भावभूमि  में  हमें  खुशी  मिलती है,  इसे किसी  दशा  में  उचित  नहीं कहा जा सकता है। सामान्य  इंसान  जिसमें  थोड़ी  सी भी इंसानियत  होगी, वह भले  ही   दूसरे के दुख में  कोई  मदद्  नहीं  कर सके,परन्तु  उससे  दुुःख में   कभी भी  प्रसन्न  और खुश  नहीं  हो सकता  हैं। ईर्ष्या  करने वाले  के प्रति  हम बात  बात पर निंदा अवश्य करते हैं, किन्तु  उसे सदैव  अपने  से ऊँचा  और बड़ा  पाते हैं। उसकी  ऊचाई और बड़प्पन  हमसे  देखा नहीं जाता, हमारे  मन में  उसके  प्रति  एक विचित्र  सा आकर्षण पैदा  होता है, और हम  अनचाहे  अनजाने  में  उसे  अपने  मानस पटल पर  उपस्थित  रखते हैं  और यहाँ  तक की उसके  बारे  में  निरन्तर  सोचते  रहते है। ईर्ष्या करने वाले को हम अपने  अंदर  स्थान नहीं  देना चाहते हैं  परन्तु  उसे  बरबस जगह मिल ही जाती है। ऐसे में  हमारी  प्रवृत्ति  अंदर  से बाहर तक नकारात्मकता से भर जाती है ऐसी  मानसिकता  अपने  विकास  में  आस्था  रखने के बजाय  दूसरों  को हानि  पहुुंचाने  में  विश्वास  रखती है। ऐसा नहीं है कि  हम अपने  इस अवगुण (ईर्ष्या) को समाप्त  नहीं  कर सकते हैं  कर सकते हैं,  ईर्ष्या  पैदा करने वाले  कारणों  को पलटकर  संकल्पपूर्वक   समानान्तर  गुणों को अपना कर इस गहरे भाव से छुटकारा  पाया जा सकता है अतः  हमें ईर्ष्या  से दूर रहकर भावना  के अमृतकणो का रसास्वादन करना चाहिए  और दूसरे की खुशी  में  भी खुश  रहना चाहिए। चरैेवेति  चरैवेति। 

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