आरक्षण की पुनः समीक्षा ( Review of Reservation)


 

एक  बार   आरक्षण  के औचित्य  पर  पुनः   पूरे देश  में बहस हो रही है/आवाज़  उठ रही है  कि ,भारत 1947 में  आजाद  हो गया था ,अपना  संविधान  लागू  हुआ,   अपने  नियम  कानून  लागू हुये । संविधान  निर्माताओं  द्वारा  10 साल तक  के लिए  आरक्षण  का प्रावधान विशेष वर्ग  के लिए    इसलिए  किया गया था  कि,  सभी नागरिकों  की  की सामाजिक  व आर्थिक  स्थिति  एक स्तर  या बराबर  तक पहुँच जाय ,   लेकिन  आजादी  के  78   साल के  बाद   भी  कोई  सुधार  नहीं  हुआ और दिखाई  दे रहा है,   तो  इसका  फायदा  क्या हुआ ? इसको  समाप्त  किया  जाना ही वेहतर होगा।  लेकिन  अफसोस  इस बात का  है  कि   हमारे  प्रतिनिधियों   ने इसको  केवल  और केवल  अपने वोट  बैंक  के रूप में  इस्तेमाल किया है जिसका  परिणाम  आज सबके सामने है। आज़ादी  कै 78  साल बाद भी आरक्षण  की मांग  और अधिक  प्रतिनिधित्व  की माँग  बलवती  होती जा  रही है, और यहाँ  तक की  जाति  वार गणना  की  मांग  की जा रही है  । आज भी देखा  जा रहा  कि इसका  लाभ  केवल  और केवल  वही  लोग  ले रहे हैं  जो एक बार आरक्षण का  लाभ लेकर  किसी  उच्च  स्तर  पर पहुंच  चुके हैं , और जिसको कि वास्तविक  रूप से  मिलना  चाहिए था , उसको मिल ही नहीं  रहा है  यह आप सभी  का  अनुभव  भी होगा  और आप अपने  आस पास  देखते  भी होंगे  । यह  उनके  साथ  भी अन्याय  है कि जो कि  आरक्षण  के वास्तविक हकदार थे, और जिनका स्तर उठाने के लिए  संविधान में   व्यवस्था  दी गयी  थी  और नहीं  मिल रहा है। आज भी कई परिवार  चाहे  वे किसी  भी  जाति , धर्म  के हो बहुत अच्छी आर्थिक  स्थिति में  नहीं हैं। ऐसे  में  आर्थिक  आधार  ही मजबूत  आधार  हो सकता है  उनके  जीवन  स्तर  को उठाने  के लिए  ,  किसी  को भी ऐसे  में  आपत्ति  भी नहीं  होगी  और न होनी चाहिए।  जातिगत आरक्षण  से समाज  में  मतभेदों को बढ़ाने  में   प्रोत्साहन  ही  मिल  रहा है और कुछ नहीं,   जो कि आने  समय  में देश के  विकास  में  बहुत ही  चिंता जनक  स्थितियां  ला सकता है। इस पर सभी  लोगों  व सरकारों  को सोचने  की आवश्यकता है  ।  यदि  जातिगत  आरक्षण  रहा तो धीरे-धीरे  समाज  में  वैमनस्यता और अधिक  बढने की पूरी  आशंकाओं  से इनकार  नहीं किया जा सकता है,और आने  वाले  समय भारत के विकास में  बाधक हो सकता है। कल्पना  करो जब योग्यता  को स्थान  ही नहीं  मिलेगा  तो  चाहे  कोई  पद हो या संस्था  व अन्य,   तो विकास  या   नये नये  आयाम  कैसे मिलेंगे   ?  यह एक प्रश्न है ,  इसका  आप सभी  पाठक  मनन कर सकते हैं।  आरक्षण   मिलना  चाहिए  तो केवल  उसको  जिसकी  आर्थिक  स्थिति  वास्तव  में  खराब है चाहे  उसकी  कोई  भी जाति हो,   जो एक बार आरक्षण  लेकर  उच्च  स्तर  तक पहुँच  चुका  निसन्देह  उसको   आरक्षण  की सीमा  दायरे  से बाहर कर देना ही  उचित  होगा, इसका  निर्णय  सरकारों   को  करना  ही होगा अन्यथा  आरक्षण  का जो घुन लगा है  वह देश हित के लिये  कतई उचित  नहीं है, और यदि  देना  आवश्यक है,  तो  आर्थिक आधार  ही बेहतर  आधार  हो सकता है, सांथ  में  यह भी कि  एक बार लाभ ले लिया   तो दूसरी बार दूसरे  कमजोर  आर्थिक  स्थिति  वाले  परिवार  के  सदस्य  को  दिया  जाना चाहिए।  अब समय  आ गया है  इस पर सभी  जाति, धर्म, वर्गों, लिंग  के लोगों  को इस पर गम्भीरता  से विचार  करना चाहिये  जिससे  समरसता, मधुरता, सम्यक्  आचरण , राग द्वेष  से मुक्त वातावरण  , समाज  में  बना रहे  और  सभी  का हित भी इसी  में  है, यही  सभी के  दिल की आवाज़  भी  होगी और होनी  भी चाहिए   तभी  देश हित   बना  रहेगा  ।      ।   चरैवेति चरैवेति  ।

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