मानव स्वभाव (Human nature)
सभी प्राणी अपने लिए निर्धारित आहार का ही भक्षण करते हैं ,सांथ ही अपने पचाने की सीमा का भी ध्यान रखते हैं किन्तु मनुष्य ऐसा प्राणी है वह इसका कदापि ध्यान नहीं रखता है। खरगोश, गाय,हिरन, आदि घास पत्तियों को खाते हैं जंगल में जबकि उनके लिए कोई कमी नहीं है फिर भी वे अपनी सीमाओं में रहकर भोजन करते हैं चूहों को ही देख लो अनाज के भण्डार में घुसकर अनाजों को खाते हैं लेकिन कभी ऐसा सुनाई नहीं दिया कि अति आहार लेकर पेट फूलकर कोई चूहा मरा हो , जंगल का राजा किसी बड़े जानवर का शिकार करने के बाद भी उसमें से उतना ही खाता है जितना उसकी आवश्यकता होती है और पुन तभी शिकार की ओर जाते हैं जब उनको भूख लगती है, परन्तु मनुष्य का कार्य व ढंग विचित्र है, वह स्वाभाविक व अस्वावाभाविक सभी पदार्थों को खाने प्रयास करता है पेट भर जाय तभी और अधिक खाने का प्रयास करता है । इसके साथ-साथ खाने का न समय है न सीमा है फलस्वरूप एक मात्र ऐसा प्राणी है, पेट खराब रहने पर भी अभक्ष्य खाकर विकार इकठ्ठे करता रहता है। श्रम एवं विश्राम के आलोक में भी सभी प्राणी अपनी प्राकृतिक मर्यादा के अनुरूप ही चलते हैं । दिन व रात का, सोने, जागने का उनका समय नियत रहता है, आलस्य में अपने शरीर को जंग लगने का कोई मौका जानवर नहीं देते हैं , लेकिन मनुष्य दिन को रात, और रात को दिन बनाकर उसका खूब उपयोग करता रहता है। मस्ती में रात भर जागेगा और आलस्य में दिन भर सोता रहेगा। इसके कारण ही वह कदम कदम पर नुकसान और दुःख उठाता रहता है। हो सकता ये बातें किसी पाठक को अप्रिय लगे, व किसी को अच्छी पर सत्य तो ये ही है मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध कई कार्य करता है। मर्यादाओ का उल्लंघन, प्रकृति के नियमों की उपेक्षा का परिणाम वह दैनंदिन जीवन में भुगतता है, जड़ की अपेक्षा पत्तियों को सींचने की विडंबना उसके साथ घटती है। उपचार के हेतु वह बहिरंग जगत मे कारणों को खोजता रहता है। पशु पक्षियों के समान स्वावलंबी तथा शिल्पी तो मनुष्य हो ही नहीं सकता है। पशु- पक्षी अपने जीवन तथा जीवनोपयोगी सामग्री के लिए किसी पर निर्भर नहीं रह्ते हैं। वे जंगलों, पर्वतों में अपना पानी व आहार खोज लेते हैं, उन्हें किसी पथप्रदर्शक की आवश्यकता नहीं पड़ती है और न किसी संकेतक की। अपनी रक्षा तथा आरोग्यता के उपाय भी स्वयं बिना किसी पूछे कर लेते हैं। यह एक दुर्भाग्य ही है कि विचार संपदा, भाव संवेदना की दृष्टि से सुविकसित मनुष्य , आहार- विहार के व्यतिक्रम के कारण सामर्थ्य क्षेत्र में अन्य जीवों से पिछड़ जाता है। इस ओर हम सभी को सोचना होगा और अपना ध्यान रखना होगा। चरैवेति चरैवेति।
बहुत सुंदर विचार
जवाब देंहटाएंthanks
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