परिवर्तन (Changes)

 


 जीवन  में  परिवर्तन  आवश्यक  होता है, परिवर्तन  जीवंतता  का प्रतीक है। स्थिर और अचल स्थिति  में जड़  पदार्थ  और निष्णा शरीर  ही रहते हैं । यदि  जीवन  चेतना का अस्तित्व है  तो परिस्थितियों में  परिवर्तन  या उतार  चढ़ाव  नितान्त  आवश्यक  एवं  स्वाभाविक है। बहुत  सारे  लोगों  का मत होता है कि अनुकूल  परिस्थितियां विकास एवं  प्रगति  में  सहायक  होती हैं  तो प्रतिकूलता  अवरोधक, कुछ  सीमा  तक इसे सही  भी मान सकते हैं लेकिन  सभी  स्थितियों  में  यह लागू नहीं  होता है। मनोबल सम्पन्न  लोगों  के लिए  प्रतिकूलता  भी चुनौती  होती है  और अनुकूलता के अपेक्षा कृत कहीं  अधिक  सहायक  सिद्ध  होती है। आपका अपना  अनुभव  होगा कि कई व्यक्ति प्रतिकूलताओं के भय से वर्तमान  ढर्रे  को बदलते  हुए  घबराते है  और सोचते हैं कि  कि परिवर्तन  को सहन करना  उनके  लिए  सम्भव  नहीं  होगा, लेकिन  मानव सत्ता  का विश्लेषण  किया जाय तो आप पाओगे  कि परिस्थितियों  के अनुरूप  अपने  को ढाल लेने की मनुष्य  की क्षमता  अदभुत है  कभी  भी जिन परिस्थितियों  में  उसको रहना  पड़ता है  वह उसी  के अनुरूप  अपने   व अपनी  शारीरिक  क्षमता  को भी ढाल लेता है। घर में  ही देख लो जब कभी-कभी  अपने  कमरे  को व्यवस्थित  करने  में   घर के सामान को आप अलग-अलग  तरीके  से  व्यवस्थित  करते हैं  तो आप हर  बार का तरीका  अलग  होता  है  और अच्छा  लगता है  ये आप सभी  महसूस  करते होंगे। परिवर्तन  को सहन न  कर पाने  का भय या आशंका  उस स्थिति  में  विशेष  रूप से उत्पन्न  होती है,  जब सुविधाजनक  जीवन में  से निकलकर   कष्टदायक  जीवन अपनाने  की जरूरत  पड़ती है, निस्संदेह सेवा,  साधना  व परोपकार  का मार्ग  सुख सुविधाओं  से युक्त  नहीं  होता है,  इसमें  अपेक्षाकृत  अधिक  श्रम करना  पड़ता है  और अपने  सुख  सुविधाओं  में  भी कटौती  करनी  पड़ती है  लेकिन  उसके  बाद का आनंद  आपके  मन को सन्तोष  देने  वाला होता है। इसलिए परिवर्तन से घबराकर कार्य भी न किया जाए तो इसे किसी भी दशा ठीक नहीं कहा जा सकता है । चरेवेति चरेवेति।

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