तन ही नहीं , मन भी साफ हो ( Not only body, but mind should be pure)

 


 आज मैं  एक प्रसंग का उल्लेख  करना  चाहूंगा  कि इससे  हम सभी  को कुछ  न कुछ सीख मिलेगी    और हम अपने  जीवन  को     अच्छे  से जीने   में  अपनायेगे।   महाभारत  की लड़ाई के बाद  पांडवो  ने एक के बाद एक यज्ञ किये,किन्तु  स्वजन हत्या  के दोष से चेतना  को रंचमात्र भी सांत्वना  नहीं  मिली। उल्टे  राजभोग के प्रति ग्लानि की  भावना  और जोर पकड़  गयी। अंत में  विदुर  जी के आदेश  को शिरोधार्य  कर माँ कुन्ती  के सहित  द्रौपदी एवं  पाॅचो पांडव  तीर्थाटन को निकल पड़े। पांडवो  का पहला  पड़ाव  व्यास मुनि  का आश्रम  था।व्यास जी ने प्रेम  से सबका स्वागत  किया  और मन शांति  के लिए  कुछ  दिन  उन्हे  अपने  पास ही टिकाया,आगे की यात्रा  के लिए  जब पांडव  व्यास मुनि  से विदा  लेने  लगे  तो महर्षि  ने अपना  तुंबा उठाकर युधिष्ठिर  के हाथों  में थमा दिया  और कहा "वत्स  तीर्थों  में  जब तुम  स्नान करो तो अपने  साथ इस तुबे को भी एक दो डुबकियां लगवा  दिया करना, तुम्हारे साथ-साथ  मेरा यह तुबा भी निर्विकार  हो जायेगा।" व्यास जी ने प्रेम से  सेवा का अवसर  दिया है, पांडव  इस प्रसंग  से खुश  हुए। अनमोल  धरोहर  के रूप में  उस तुंबे   को सहेज कर रखा  और पुण्य  सलिलाओ में  स्नान  करते  समय उसे  भी स्नान कराया। जब पांडव  वापस लौटे तो अंतिम  पड़ाव  व्यासाश्रम ही था।सबने  व्यास जी के चरण स्पर्श  किये मुनिराज ने गदगद  भाव से सारे  परिवार को  देखा  और यात्रा  का विवरण  पूछा। कुछ  विश्राम  करने  के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने  अपने थैले से वह तुंबा निकाला  और व्यास जी के सामने  रखकर कहा " भगवान! यह आपका  तुंबा है,हमने  इसे  हर  पवित्र  नदी  में  स्नान  कराया है, और इसमें  कहीं  भी हमारी  चूक नहीं  हुई  है।"व्यास जी ने  पांडवो को निहारा और  भीम से कहा  " बेटे,  जरा  इस तुबे  को फोड़ कर  लाओ हम सब प्रसाद  के रूप में  इसे खाकर  तीर्थों  का पुण्य  लाभ प्राप्त करेगे "। द्रौपदी  ने एक एक  टुकड़ा  सारे पांडवो  को बांट दिया  और बाकी  व्यास जी के सामने  रख दिया, व्यास  जी ने एक टुकड़ा  चखा  और घृणा  हे उसे एक ओर थूक दिया " अरे  ! यह तो  वैसा  ही कड़वा  है जैसा  पहले  था ? क्या   तुम  लोगों  को भी यह कड़वा  लगा? " अर्जुन  ने कहा  महाराज  तुंबा तो कड़वा  ही होता है  वह मीठा  कैसे  लगेगा  ? महर्षि  व्यास  ने आखे  उठाकर  कह " वत्स  यह तो तीर्थ   स्नान  कर आया  है  इसे तो मीठा होना  चाहिए  था  । कडवाहट  अर्थात  विकार को मिटाने के लिए ही तो  लोग  तीर्थाटन  करते हैं। कुन्ती  चुप रह न सकी और बोली " प्रभो   स्वभाव  भी कहीं  बदल सकता है  ? प्रकृति के  नियम  तो कभी  भंग  नहीं  होते "। महर्षि  व्यास  देवी कुन्ती के जबाब  सुनकर  पुलकित हो  गये  " नहीं  देवी प्रकृति के नियम  तो   सनातन हैं  कैसे  बदल सकते हैं? किन्तु  स्वभाव  के ऊपर जो विकृतिया छा  जाती हैं  और उसे  मलिन  कर देती  वे तो हटायी  जा सकती हैं  किन्तु  उसके लिए  तन के स्नान   के बजाय  मन के स्नान  की ही मुख्य  आवश्यकता  है। मेरा  तुबा  तो जैसा  गया  था वैसा  ही आया।  तुम  लोग  भी जैसे  गये थे  वैसे  ही  आये  हो,  मन की ग्लानि  में  कोई  फर्क  आया है  क्या  ? युधिष्ठिर  तुमने  देख  लिया  है  न  कि  मन का भार न तो  अपने  से बाहर भागने  से उतरता है  और न दूसरों  पर उसे  छोड़  देने से । सोने  सा निर्मल होने के लिए  स्वयं  ही आग में  तपना होता है इसलिए  व्याकुलता  छोड़ो । पश्चाताप  अपने आप में  महान तपस्या  है। चरैवेति चरैवेति। 


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