आलोचना (criticism)
अधिकतर लोग अपनी प्रशंसा दूसरे से सुनना चाहते हैं और जब कोई प्रशंसा कर रहा होता है , तो उनको बहुत अच्छा लगता है चाहे वह किसी क्षेत्र में काम कर रहा हो। यहां तक की उस व्यक्ति को अपने पास बिठाना पसन्द करते हैं और बार बार अपने पास बैठाते हैं । इसके विपरीत वे अपनी आलोचना नहीं सुन सकते हैं यदि कोई आलोचना कर रहा होता है , तो उससे उनको परेशानी होती है यहाँ तक कभी-कभी उसके साथ झगड़ा भी कर देते हैं । हम अपने काम के बारे उतना अच्छा नहीं बता सकते हैं जितना दूसरा उसका मूल्याकंन करके बता सकता है। आलोचना की तुलना यदि औषधि से की जाय तो कुछ भी बुरा नहीं है, औषधि अल्प मात्रा में लेने से वह प्रभावशाली होती है उसी प्रकार आलोचना हमें अपनी त्रुटियों की समीक्षा करने को प्रेरित करती है कि हम कहाँ ग़लत हैं और अहंकारी होने से बचाती है और सही मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है। मुझे लगता है कि मनुष्य का यह एक स्वाभाविक गुण है वह जीवन में अधिकतर प्रशंसा और सम्मान पाना चाहता है, कोई भी जीवन में अपनी निंदा, उपेक्षा, या अपमान नहीं चाहते हैं, लेकिन कभी-कभी इनका सामना करना पड़ सकता है और तब यह कष्टदायक होता है। यदि आलोचना को सकारात्मक रूप से देखा जाय तो वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए लाभदायक हो सकता है, उसकी प्रगति में सहायक हो सकता है ,आलोचना को समीक्षा की तरह स्वीकार करने से मनुष्य के जीवन में निखार व त्रुटियों में सुधार आता रहता है। यह भी सच है कि आलोचना मिलने से व्यक्ति आहत होता है, लेकिन इसी के माध्यम से व्यक्ति न केवल जीवन के प्रति नया सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर सकता है। आलोचना मनुष्य को अपना पूनर्मूल्याकन करने का अवसर देता है । जीवन में की गयी छोटी छोटी गलतियाँ व भूलें ही हमें समस्याओं से घेर लेती हैं, या यों कहें कि कठिनाइयों में डाल देती हैं। जिन घटनाओं को हम नगण्य समझ कर उनकी उपेक्षा कर देते हैं वे ही सही समय आने पर अपने महत्व व अपने मूल्यों को बतलाते हैं और सोचने का अवसर प्रदान करते हैं। यही अवसर आलोचना के परिदृश्य में आपके पास आता है , हो सकता आपका अनुभव हो या आने वाले समय में आप महसूस कर पायें कि , प्रशंसा और सम्मान पाने पर व्यक्ति अहंकारी हो जाता है और अपने कर्तव्य मार्ग से विचलित हो जाता है, जबकि आलोचना मिलने से व्यक्ति सही रास्ते पर आता है ,विरोध, निन्दा, उपेक्षा,,अपमान आदि उस कटु दवाई के रूप में हैं, जिसको निगलने में तो कठिनाइयां होती हैं पर बाद में आराम मिलता दिखाई देता है,और बाद का परिणाम अच्छा लगता है। 35 साल की शासकीय सेवा दौरान कई प्रकार के लोगों से वास्ता पडा और अलग-अलग तरह के व्यवहार के लोग मिले, कुछ लोगों के गुणों/अवगुणो को मैंने महसूस किया होगा, और कुछ लोगों ने मेरे भी गुण/अवगुणो को महसूस किया होंगा, लेकिन एक बात तय है कि आलोचना से बिल्कुल घबराना नहीं चाहिए सही कार्य के लिए आगे बढ़ना ही चाहिए , इसमें यदि आलोचना होती है तो होती रहे। सभी के मित्र भी होते हैं और शत्रु भी, सभी तरह के लोग हैं, कुछ लोग आपकी सफलताओं पर खुश होते होंगे और हो सकता है कुछ दुःखी भी हो । सच्ची प्रशंसा जहाँ आपका/हमारा उत्साह बढाती है वहीं सही आलोचना भी हमारा मार्ग दर्शन करती रहती है। चरैवेति चरैवेति।
सुंदर लेख सर जी
जवाब देंहटाएंAbsolutely true 🙏🏻🙏🏻
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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