बच्चों की मनोवृत्ति (children's attitudes)
माता- पिता /अभिभावकों को अक्सर यह कहते सुना जा सकता है कि, मेरा बच्चा बड़ा शरारती/उदण्ड/लापरवाह/आलसी आदि आदि है । उसको कैसे सुधारा जा सकता है ? यदि बच्चा वास्तव में शरारती / उदंण्ड है तो माता पिता/अभिभावकों के लिए यह चिंता की बात हो सकती है । लेकिन कई अनुसंधानों में यह सिद्ध हो गया है कि ऐसे बच्चे असाधारण प्रतिभा सम्पन्न होते हैं, और ऐसे बच्चों की प्रतिभा को पहचान करना माता पिता व शिक्षकों के लिए भी कठिन होता है। ऐसे बालक मेधा के धनी होते हैं, कई प्रकरणों में देखा जाता है कि ऐसे बालक पढाई लिखाई में तो सामान्य होते हैं पर अन्य क्षेत्रों में ये असाधारण होते हैं। आप अपने घरों में भी बच्चों को देखकर अनुभव करते होंगे कि कभी-कभी आपका बच्चा पढाई लिखाई से अलग कुछ अलग ही कार्य में लगा रहता है , और आप उसको ऐसा करने के डांट लगाते हैं तो वह आप से छिप छिप कर उस कार्य को करता रहता है या करत रहेगा । ऐसे बच्चों को निसन्देह innovation के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । मनोवैज्ञानिकों ने शरारती बालकों में शोध के दौरान कई विशिष्ट बाते देखीं है, प्रथम उनकी तीक्ष्ण स्मरण शक्ति, किसी बात को एकबार में पढ या सुन लेकर याद रहना, जिज्ञासा की प्रवृति, कल्पनाओं की शक्ति का होना, नेतृत्व की क्षमता होना आदि गुणों से युक्त होते हैं। ये बच्चे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व भावनात्मक क्षेत्र में सामान्य बालकों की तुलना में श्रेष्ठ होते हैं । बुद्धि से अर्थ अब तक उच्च आई0 क्यू0( IQ) से लगाया जाता रहा है ,लम्बे समय से वह मेधावी का पर्याय बना रहा है या बनता है पर मनोविज्ञानी बताते हैं कि मेधावी एक बहुअर्थी शब्द है ,जिसका मतलब सिर्फ शैक्षिक योग्यता तक ही सीमित नहीं माना जाना चाहिए। अनपढ़ टेक्नीशियन या मशीन मैन भी मेधावी हो सकते हैं, ये बात अलग है उनकी मेधा यांत्रिक क्षेत्र में विकसित होती है और हो रही है। कई क्षेत्र जैसे वाणिज्य, सिलाई,गायन,वादन,नृत्य, अभिनय,गृह कार्य,खेल का क्षेत्र, बातचीत का क्षेत्र, आदि जैसी दूसरी विधाओं में पारंगत रहते हैं या पारंगत हो सकते हैं तब ऐसे बालकों की विशिष्ट क्षेत्र की मेधा के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह भी सत्य है कि हर बालक में अलग-अलग प्रतिभा के लिए जिम्मेदार मस्तिष्कीय भाग समान रूप से विकसित नहीं होते हैं, किसी का गायन वाला हिस्सा, किसी का वादन वाला हिस्सा तो किसी का कला वाला आदि विकसित होता है इस पर भी ऐसे बच्चे को होनहार न कहना, ठीक नहीं कहा जा सकता है, या बच्चे के साथ अन्याय होगा, इस दृष्टि से सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने वाले को प्रतिभा सम्पन्न कहना उचित होगा। संतान/पुत्र की स्थिति में यह सुनिश्चित करना अभिभावक का कर्तव्य है, कि उसमें किस प्रकार की क्षमता योग्यता निहित है, और किस तरफ उसकी रुचि है , उसी दिशा में उसको प्रोत्साहन दिया जाना उचित होगा। हम सभी को अपने अपने बच्चों को हर क्षेत्र में पर्याप्त अवसर दिया जाना चाहिए। चरैवेति चरैवेति।
सुंदर सार्थक विचार
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