दृष्टिकोण (Perspective)

     


किसी एक  व्यक्ति का किसी  दूसरे  व्यक्ति  के प्रति  दृष्टिकोण  कैसे  बनता  , क्या  इसका  आपको  अनुभव  है  , अवश्य  अनुभव करते होंगे।  सामान्यतया जो आपके  विचारों  से सहमत होता  है वह आपका  सहयोगी  व प्रशंसक  हो सकता है,  और जो आपके विचारों से सहमत  न  होता  हो व आपका  सहयोगी  नहीं  हो सकता है  , और न ही  प्रशंसक  होगा। आपका  आलोचक  अवश्य  हो सकता है।   अब  इसी से  प्रसन्न  एव अप्रसन्नता  की स्थिति  पैदा  होती है।   प्रसन्नता  एक मनोभाव  है,एक सकारात्मक  मनोदशा है। हमारी  जैसी  मनः स्थिति  होती है  वैसे ही  हमारे  शरीर  मे भौतिक  व रासायनिक  परिवर्तन  होते  रहते हैं। हमारी  मनोदशा  जीवन की  परिस्थितियों  के प्रति  जन्म  लेने  वाली  प्रतिक्रिया  से जुड़ी  होती है,  और हमारी  प्रसन्नता  व खिन्नता भी इसी बात पर निर्भर  करती है, कि प्रतिकूल और अनुकूल  घटनाओं  से हमारा  मन  कितना  प्रभावित  होता है। आजकल  सामान्यतया  खुशी का आधार  संपत्ति, शक्ति, योग्यता, प्रतिभा, और समाज  से प्राप्त होने वाली   प्रतिष्ठा  आदि से  ही होते हैं । जब खुशी  का आधार  बाहरी होता है  तो इसके  साथ   यह भी डर होता है  ,  कहीं   खुशी  या प्रसन्नता  छिन्न न जाय, और  इसी  में  अधिकतर  समय निकल  जाता है। बाहरी  परिस्थितियों के  कारण प्राप्त होने  वाली  प्रसन्नता  का आधार  अस्थायी  होता है  क्योंकि  परिस्थितिया कभी भी  स्थायी  नहीं  होती हैं  ,  वे बदलती  रहती हैं। लेकिन  जब प्रसन्नता   आन्तरिक  होती है,  तो वह स्थायी  हो सकती हैं, क्योंकि  यह  प्रसन्नता  बाहरी  तत्वों  पर निर्भर  नहीं  होती है ,इसलिये  जो मनुष्य  अपने  भीतर  जितना  गहराई  मे  उतरते हैं, वे उतने  ही अधिक  सहज व प्रसन्न  होते हैं   ऐसा   माना  जा सकता है,  और उनकी  प्रसन्नता  स्थायी  तौर पर टिकी  रहती है। इसका  आशय  यह है कि  बााहरी  तत्वों  व वातावरण  पर जितनी  निर्भरता  घटेगी तो आंतरिक   खुशी  की   मात्रा  में  बढ़ोतरी होती  रहेगी। देखा जाये तो  अधिकतर  लोग  प्रसन्नता  प्राप्ति के लिए  ही कार्य  करते  रहते हैं , चाहे  वे किसी  भी प्रकार के  कार्य हो । इसका  आप सभी  को अनुभव  भी होगा, या अनुभव  भी करते  होंगे  कि , व्यक्ति   यदि किसी  क्षेत्र  में  या किसी  पड़ाव पर  या मार्गों पर  सफलता  न मिले  तो  या सफलता  मिलने की सम्भावना  कम होती है ,  हो तो उस मार्ग  को छोड़  देते हैं।  जीवन  के जिस  क्षेत्र में  आनंद  प्राप्ति  कामना  अथवा  संभावना  नहीं  दिखाई  देती है  लोग  उस मार्ग का चयन नहीं करते हैं।  प्रसन्नता व्यक्ति  में  उत्साह लाकर  उसकी  शक्तियों  को एकत्रित करती है  और सफलता  सुनिश्चित कर देती है।  सकारात्मक दृष्टि से  किया  गया  कार्य  अनिवार्य  रूप से  प्रसन्नता में  ही आश्रय  पाता है।  इस प्रकार  दृष्टिकोण  एक व्यक्ति की  सोच व नजरिया को दिखाता है  और जीवन  की दिशा  व दशा  तय करता है ,हमेशा  सकारात्मक  रहना  सफलता का  मार्ग  आसान  बनाता है  जबकि  नकारात्मक  सोच  सफलता का  रास्ता  कठिन  बनाती है। इसलिए  हमें   असंतुष्ट, और क्षुब्ध  नहीं  रहना  चाहिए  क्योंकि  ऐसे  भाव जहाँ  रहेंगे वहीं  विक्षोभ  पैदा करेंगे  और हो सकता है  इस के कारण  मानसिक  संतुलन  ठीक  न रहे  और आगे  दिक्कत  हो। प्रसन्नता  के सुख  की तुलना  किसी  से नहीं की जा सकती है  यह सभी  को सुकून देने वाली  होती है।  इसलिए  हमेशा  सकारात्मक  दृष्टिकोण  रखना  जीवन के लिए  परम आवश्यक है। चरेवेति चरेवेति। 

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