दर्पण (Mirror )

   


जब हम दर्पण  के सामने  खड़े  होते हैं  तो वही चित्र  शीशे  मे  दिखता है  जो हम होते हैं  ठीक  यही  स्थिति   सभी  व्यक्तियों की  या दर्पण  के सामने  रखी वस्तु  की होती है।  उसका  वास्तविक  प्रतिबम्ब   दिखाई देता है।  सम्राट  मार्कस आरेलियस महान चिंतक  और विचारक की  प्रेरणा  देने  वाले  वाक्य आज भी दुनिया के लिए  प्रासंगिक हैं। मार्कस ने आत्म चिंतन  किया  और  अपने  लिए  जो टिप्पणीया की है,  वह आज सार्वजनिक  बन गयी हैं। मार्कस आरेलियस ने हदय की सच्चाई  पर बल देते हुए  लिखा है " कोई  भी  काम करो,  तो उसे  मन लगाकर, विवेकपूर्वक,  परहित  को ध्यान  में  रखकर  करो। व्यर्थ  बातें  न करो।  दूसरों  के काम में  दखल न दो। अपने  वाक्चातुर्य  से अपनी कमजोरियों  को छिपाने  का प्रयत्न  न करो। अपने  हृदय  में  बसने  वाले  परमात्मा  की उपासना  करो। धैर्य  और नीति  से कभी  विचलित  न होने  वाले  राजा बनो। मन को प्रारम्भ  से ही शुद्ध  और दृढ़  रखो।सत्य का अनुसरण  करो ।यही  साधना  है। मनन ही मानव जीवन  है। "  यह विवाद  उठाया  जा सकता है  कि सुखद वस्तुओं  से दूर रहने की  क्या  आवश्यकता है  ? यह अवश्य  विचारणीय  है । पाशविक  सुखों  को हम सच्चा  सुख  क्यों  मानें? मनुष्य  को बुद्धि  दी है। बुद्धिपूर्वक सोचने  पर जो सुख उँचे  दर्जे  का मालूम  हो, वही  सच्चा  सुख  है। जिससे  केवल शरीर  को सुख पहुँचता है वह कभी भी  सच्चा  सुख  नहीं  हो सकता है। अहंकार  और घमंड  से हमेशा  दूर रहो। सब बातो  को भूलकर  अपने  मन रूपी विर्जन झोपड़े  में  चले  जाओ और वहां  बैठकर मनन करो।स्वतंत्र  बनो।मनन करते  समय  यह कभी  मत भूलो  कि विश्वरूपी  बृहत परिवार  के तुम  एक सदस्य  हो,एक न एक दिन  तुम्हे इस दुनिया को  छोड़ना  ही पड़ेगा। इस प्रकार के  विचार  चिंतन  से बहुत  लाभ मिलेगा। काल चक्र  निरन्तर  घूमता  रहता है। जो नीचे  रहता है  वह ऊपर हो जाता है  और जो ऊपर रहता है  वह नीचे  आ जाता है। जो नियम  बनाया गया  है  उसके  अनुसार  ही चक्र  चलता  रहता है। किसी  ने यदि  आपके  साथ  निर्लज  व्यवहार  किया है  तो उस पर नाराज  होना  ठीक  नहीं है। जरा  सोचो  तो  सही कि यह कभी  भी हो   सकता है  कि दुनिया  में  एक भी व्यक्ति  ऐसा  न हो ?  यदि  ऐसा  होना  असंभव  है, तो फिर तुम  एक असंभव  वस्तु  की इच्छा  करके  दुःखी  हो रहे  हो। दुनिया  में  कुछ  निर्लज्ज  मनुष्य भी  हैं  , तुम्हे  मानना  पड़ेगा  कि संसार  को सर्वथा  दुष्ट रहित  नहीं  बनाया जा सकता है। यह बात तुम्हारी  समझ में  आ जाय तो कपटी, और चोर पर भी तुम दया ही करोगे। एक बात और है, सब बुराइयों  की  एकमात्र  औषधि तुम्हारे  अपने  सदगुणों से  है।  जो  द्वेष  करे उससे  प्रेम  करना  ही उसे  सुधारने  का मार्ग  है,  हर  अवगुण,   गुण से ही सुधरता है,  सदा  कर्तव्य  पालन करने  में  तुम आनन्दित रहोगे, इसलिए  तुम  जैसे  होगे वैसे ही दिखाई  देंगे। चरेवेति चरेवेति। 

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