भारी भरकम बस्ते का बोझ ( heavy school bag)
आज का विद्यार्थी ही कल को समाज में विभिन्न सेवाओ में जाता है यथा उसमें ही नेतृत्व देने वाले से लेकर विभिन्न सेवाओं को देने के लिए भी तैयार होंगे। उसका नेतृत्व कैसा होगा चाहे वह किसी भी सेवा में जाने वाला हो, यह उसकी शिक्षा व नैतिक मूल्यों पर आधारित होगा। यदि उसकी शिक्षा और नैतिक मूल्य उच्च स्तर के होगे तो निश्चित ही समाज में अच्छी सेवाओं को प्रदान करेगा , ऐसा आप सब सोचते होंगे, या अनुभव भी करते होंगे, इसलिए विद्यालयो में दी जानी वाली शिक्षा ज्ञानवर्धक एवं प्रयोगधर्मी और नैतिकता पर विशेष बल देनी वाली होनी चाहिए। शिक्षा ऐसी हो जिसे बच्चे प्रसन्नता के साथ-साथ खेलते सीख सके। मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धक शिक्षा बच्चों को प्रोत्साहित व प्रभावित करती हैं। इसके लिए बस्ते में भरी किताबो व कापियों के जखीरे की आवश्यकता नहीं पड़ती है । प्रयोगधर्मिता से रहित शिक्षा आज के बच्चों को पुस्तको के बोझ ढोने के लिए विवश करती है , और इसी कारण बच्चों का बस्ता इतना भारी हो गया है कि बच्चे इस भार से दबने लगे हैं। दुर्भाग्यवश इस भार को कम करने के लिए या बच्चों को हल्का बस्ता देने के सम्बन्ध में कोई ठोस कदम और निर्णायक कदम नहीं उठाए जा रहे हैं , यह एक चिन्ता का विषय हो सकता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति बच्चों को किताबों से भरा भारी भरकम बस्ता थमा देती है, बच्चों को ढेर सारी किताबों को लेकर स्कूल जाना पढता, बच्चों के पास हर विषय की अलग अलग किताबें होती हैं, text book, work book, notebook आदि को मिलाकर , हर दिन, में 15 से 20 किताबें हो जाती है , जिसको लेकर बच्चों को स्कूल जाना पढता है । इसलिए इस पर स्कूलों/शिक्षा विभाग को अवश्य चिन्तन कर समाधान निकाल लेना चाहिए। इस सन्दर्भ में सी बी एस ई ने कहा था कि दूसरी कक्षा तक के बच्चों के बस्ते तो विधालय में ही रहने चाहिए। विद्यालय ऐसे time table बनाये ताकि बच्चों हर दिन ज्यादा किताबें लाने की जरूरत न हो,भारी बस्ते से बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास थम सकता है। इस पर अभिभावको को भी ध्यान देने की आवश्यकता होगी साथ में वे स्कूल से समन्वयन अवश्य करें, तथा अतिरिक्त किताबों को देने से बचे। वैसे यदि कोई ऐसी व्यवस्था बन सके कि एक माह का सभी विषयों का syllabus एक ही किताब में आ जाय, दूसरे महीने का syllabus ( सभी विषयों का) दूसरी किताब में आ जाय, इस प्रकार पूरा syllabus को 10 माह में बाँटा जाय, और 10 किताबें 10 माह के लिए, तो प्रत्येक माह केवल 1 किताब, एक note book, व एक कापी ले जानी पड़ेगी, इस प्रकार पूरे विषयों के पाठ्यक्रम को 10 किताबों में देकर बस्ते का बोझ कम हो सकता है, कम से कम कक्षा 5 तक तो ऐसा कर ही सकते हैं। जिस पर सम्बंधित विभाग सोच सकता है। चरैवेति चरैवति ।
🙏🙏 आपने उचित सुझाव दिया है।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर जानकारी
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