भोजन की आदत (Habit of Food)

   


जीवन  जीने के लिए  सबसे  महत्वपूर्ण   अवयवों  में    हवा  और पानी के बाद  भोजन  का सबसे  महत्वपूर्ण  स्थान  होता  है। इसलिए  भोजन  हमारे जीवन  का सबसे  महत्वपूर्ण हिस्सा  है, इसी के आधार  पर  काफी  कुछ हमारा  स्वास्थ्य  निर्भर करता है। हमारे  शरीर  व मन के निर्माण  के साथ-साथ  हमारे व्यक्तित्व  का निर्माण  भी हमारे  ख़ान पान से जुड़ा  होता है, आप सबने  महसूस किया  होगा कि हमारी  भोजन या ख़ान  पान की  मूल  आदतें  जीवन  के (बचपन)  आरम्भिक  सालों  में  तय हो जाती है।  वैसे तो बच्चों  का आरम्भिक  भोजन  दूध होता है, और अन्नप्राशन संस्कार  के बाद बच्चे  को अन्न  देना  आरम्भ  करते हैं,  और इसी के साथ खाने  में  क्या-क्या   खाना  चाहिए, की आदतें  बनने  आरम्भ  हो जाती है सामान्यतया  भोजन  का सम्बन्ध  स्वाद से होता है,  जिस  अवयव  का  स्वाद  अच्छा  लगता है   उसे  हम पसन्द करते हैं  और जिसका  स्वाद  हमे अच्छा  नहीं  लगता  उसे हम नापसंद  करते हैं , और स्वादिष्ट  खाना  आरम्भिक  अवस्था  (आरम्भिक  वर्षो) में  ही  काफ़ी  कुछ    हमारी  पसन्द  और नापसन्द तय कर लेता है । स्वाद की इसी दिलचस्पी  ने आज कई प्रकार  के व्यंजनों  व थालियो ( जिसमें  कई प्रकार के  पकवान  रखें  हो) का निर्माण  कर दिया है जो कि बाजार  में  उपलब्ध हैं  । स्वाद एक ऐसी  चीज है  जिस पर  सबका नियंत्रण  नहीं  होता है ,  फिर बच्चों  का तो और भी मुश्किल भरा काम है , वे विभिन्न  प्रकार के  स्वाद के लिए  ललचाते है।  यह अभिभावकों  का महत्वपूर्ण  कार्य  भी  है  कि वे समय-समय  पर अपने  बच्चों  के ख़ान पान  की आदतों  में सुधार करते  रहे, या अच्छे  खाने की आदत  डालते रहे,  जिससे कि आने वाले  समय  में  ख़ान पान  के कारण  उनका   स्वास्थ्य  अच्छा  रहे। जब बच्चा  छोटा होता है  तब वह  खान पान के बारे  कोई  समझ नहीं  रखता  और ऐसे  स्वादिष्ट  आहार  की जिद करता है  जो कि उसके खाने  के  लिए  लाभदायक  नहीं है  परन्तु  उसे  अच्छा  लगता है , किन्तु  जब  तक  वह बड़ा  होता  है  और  उसकी समझ आहार/भोजन  के बारे   में  विकसित  होती है,   तब तक उसकी  आदतों  में  वह भोजन  आवश्यक  हो जाता है, और   अब  वह चाहकर  भी    उस  आदत  को  सुधार  नहीं सकता   है। आजकल  कम उम्र  में  ही  बच्चो  को  गलत खान पान  के कारण    कई बीमारिया  लग जा रही हैं,  जिसका सबसे  प्रमुख   कारण,  भोजन   की बिगड़ी  आदतों  का समूह  कहूँ  तो कोई  हैरानी  नहीं  होनी चाहिये,  इसलिए  बचपन  से ही  पोषक तत्वों  से युक्त  भोजन की  आदतें  विकसित  की जानी  उचित होगी, और  ख़ान पान के  बारे  में  बच्चों की  समझ को अच्छे  से विकसित  किया जाय  तो बेहतर होगा ।  जहाँ तक सम्भव हो  घर पर बना  भोजन  खिलाने की आदत डालनी चाहिए, इसके  लाभ बता कर   काफी कुछ   ख़ान पान  की आदतों  को सुधारा जा सकता है।  एक महत्वपूर्ण  बात यह है कि  छोटे  बच्चों  में  देखकर  सीखने  की आदत होती है  ऐसे  में  घर में  जो बड़े  सदस्यों को भी  अपनी  खाने  की  आदतों  में  भी  सुधार  करना  होगा, पहले  बच्चों  के सामने  ऐसे  भोजन स्वयं   ले , जो कि वे बच्चों को  खिलाना चाहते हैं ।  (उदाहरण के लिए, फल, सब्जियां, दालें, दूध, अंकुरित  दाल , मेवा आदि ,) एक बात  का  उल्लेख करना  चाहूंगा  , खाने  को लेकर  कभी भी  बच्चों  को डांट  नहीं  लगानी  चाहिए  या टोकना  भी  हितकर नहीं है,   ऐसे  में  बच्चे  अवसाद का शिकार हो  सकते हैं। बच्चों  की  सेहत  के लिये  सही  पोषक तत्वों  से युक्त  भोजन  को देने के लिए  समझाना  व मनवाना  आवश्यक है ,  ऐसे  में   बच्चों  को प्रेम से ही  खाने  की आदतों  में  सुधार  किया जाय तो  उतम  रहेगा।  चरेवेति चरेवेति। 


 

टिप्पणियाँ

  1. प्रणाम सर 🙏💐

    आपका लेख बहुत महत्वपूर्ण विषय पर है और इसमें बच्चों के खान-पान की आदतों को लेकर गहरी अंतर्दृष्टि दी गई है। यह बिल्कुल सही है कि शुरुआती वर्षों में विकसित हुई भोजन संबंधी आदतें व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को प्रभावित करती हैं।


    स्वस्थ भोजन की महत्ता: आपने यह बात बहुत प्रभावी ढंग से रखी है कि सही खान-पान न केवल शरीर बल्कि मानसिक विकास और व्यक्तित्व निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


    बचपन की आदतें: यह सत्य है कि बच्चे खाने की आदतें बचपन में ही विकसित कर लेते हैं, और यदि उन्हें आरंभ से ही पोषक तत्वों से भरपूर भोजन दिया जाए, तो भविष्य में वे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से बच सकते हैं।


    आपने अभिभावकों की जिम्मेदारी पर जो जोर दिया है, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों में पोषण के प्रति जागरूकता लाने के लिए माता-पिता को भी अपने खान-पान की आदतों में सुधार करना आवश्यक है।


    प्रेमपूर्ण व्यवहार: बच्चों को भोजन के लिए डांटने या जबरदस्ती करने की बजाय प्रेम से समझाने की बात बहुत अच्छी लगी। यह एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी सही है, क्योंकि नकारात्मक माहौल से बच्चे भोजन को लेकर और भी जिद्दी हो सकते हैं।


    आपका यह विचार कि "जहाँ तक संभव हो, घर का बना भोजन खिलाने की आदत डालनी चाहिए" बिलकुल सही है। आज के समय में जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड के बढ़ते प्रभाव के कारण बच्चों में कई स्वास्थ्य समस्याएँ देखी जा रही हैं। इसलिए, पोषण से भरपूर संतुलित आहार और सकारात्मक माहौल से ही हम बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की नींव रख सकते हैं।

    "*चरेवेति चरेवेति*" – अर्थात निरंतर आगे बढ़ते रहें, यही जीवन का सार है। यही सिद्धांत स्वस्थ जीवनशैली और सही खान-पान की आदतों के विकास पर भी लागू होता है। आपका लेख प्रेरणादायक है और समाज में जागरूकता लाने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

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  2. बहुत ही शानदार विशलेषण, इसके लिए धन्यवाद

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  3. सुन्दर विश्लेषण, इसके लिए धन्यवाद

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  4. बहुत बहुत सुंदर , वर्तमान समय को मध्य नजर रखते हुए बिल्कुल सही और उपयोगी जानकारी 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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