मस्तिष्क (Brain)

     


  मनुष्य की बनावट के बारे में यदि ध्यान देकर व एकाग्रता  से सोचा  जाए, तो मन में यही विचार आता है कि परमात्मा ने कितने अदभुत तरीके से मानव  को  बनाया है, उसके अलग-अलग अंगों का निर्धारण व उनके कार्यो  को तय किया है। भगवान  ने   मनुष्य ही नहीं संसार के सभी  प्राणियों  की उपयोगिता उनके  बनावट  के आधार पर  निर्माण   तय किए  है  , चाहे  वह कोई भी प्राणी  हो। इस पर  भी   मस्तिष्क  को विशेष  जिसे  मनुष्य का  मित्र कह सकते हैं,   तो कोई  अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि  वही  उसको सही गलत  राह दिखाता है  और सही पर चलने की प्रेरणा देता रहता है।  जब भी मनुष्य को कोई  सूचना देनी  हो या प्राप्त  करनी  हो  मस्तिष्क  ही सबसे  पहले  उस पर विचार करता है। मस्तिष्क  को  ही अपना  नेता  समझना चाहिए। मनुष्य को तब दिक्कत  महसूस  होती है  जब वह अपने  अन्दर  किन्हीं  बातों  को स्थायी  रूप से  स्थापित कर  लेता है  और उसके  विषय में  समझना  व सोचना  छोड़  देता है । जो बात  जिस  प्रकार  स्थापित  हो गयी  है, उसको उसी प्रकार  मानने  से मस्तिष्क की अपनी  मौलिकता  समाप्त  हो जाती है और जब वह सोचता  भी है तो वह  यह कि पूर्व  स्थापित  विचार के बारे  में  कि  अमुक  ने तो यह विचार  मजबूती  से अपने  पास रखा है  और उसी  के अनुरूप  यह कार्य  कर रहा है। यह ठीक  उस प्रकार  से जैसे  रेल की पटरी  चलने  वाली  गाड़ी  जहाँ  पटरी  रेल गाडी  को ले जायेगी  वह वही  जायेगी। इसी प्रकार  पूर्व  मान्यता  बनी  रहने  से मस्तिष्क  भी ऐसा ही   सोचता है। आपने  महसूस  किया  होगा  जब आप हमेशा  किसी अपने  मित्र   से सलाह  लेते हैं और आगे  कार्य  करते  रहते हैं,   तो एक समय ऐसा  आयेगा  जब  आप का मस्तिष्क  भी उस मित्र की सलाह  का अभ्यस्त  हो जायेगा,  और जब  कभी  मित्र सलाह  देने  की स्थिति  में  नहीं  होगा  तो आप परेशानी महसूस  करेंगे। जिस प्रकार  किसी  मित्र  के प्रभाव  में  रहने  से कोई  तउसका परामर्श  मानने का अभ्यस्त  रहा  करता है  उसी  प्रकार  मस्तिष्क  के प्रभाव  में  रहने  से मनुष्य  उसकी  आज्ञा  मानता  ही है।  ऐसी  दशा  में  मस्तिष्क सही   परामर्श  देने  में  सक्षम  नहीं  होता है।  संसार व अपने  आस-पास  में  फैले  हुए  संघर्षों  के मूल पर विचार  किया जाय तो  पता चलेगा कि वर्तमान में अशांति का मुख्य  कारण  अपनी  अपनी  मान्यताओं  के प्रति  मनुष्य का पक्षपात  ही है। कोई  साम्राज्यवाद में  संसार  का कल्याण  देखता है तो कोई  समाजवाद में, कोई  स्थायी  सुख  शांति  को मानता है  तो कोई  सह अस्तित्व  को, कोई  हिंसा  में  विश्वास करता है  तो कोई  अहिंसा, कोई  आस्तिकता  की दोहाई  देता है तो कोई  नास्तिकता  को आवश्यक  समझता है। किसी  की उपासना  पद्धति  निराकर  की ओर जाती है  तो किसी  की साकार की ओर, यदि  देखा जाये तो  मान्यताओं    की असंख्य  संख्या  है, और ऐसी  दशा  में  जब कोई अपनी  मान्यताओं  की श्रेष्ठता  का अनुचित  दुराग्रह करेगा  तो कलह क्लेश ,लडाई  झगड़े  के अवसर पैदा  होंगे। अपनी अपनी मान्यताओं के  पक्ष में  मानव  मस्तिष्क  ऐसे ऐसे  तर्क  ऐसी  दलीलें  प्रस्तुत  करता है  जिनको  सुनकर  मान लेने को जी करता है। इस प्रकार  जब एक पक्ष  सुना जाता है  तो यह ठीक  है  पर जब दूसरे  पक्ष को सुना जाता है  तो लगता  है  यही  ठीक  है,  दोनों  ठीक  कैसे हो सकते हैं  ? सही  निर्णय  पर पहुँचने  के लिए  आवश्यक  है कि उभय पक्ष  को तटस्थ  होकर सुना  जाय और  उनके  कथन पर स्वतंत्र  मस्तिष्क  से सोचा  जाए,  तभी  किसी  सही  निर्णय  पर पहुँचने  की सम्भावना  हो सकती है। इसलिए कभी भी  अपने  मित्र  एवं  पथ प्रदर्शक  नेता  मस्तिष्क  को यथा  सम्भव  मुक्त  एवं  निर्विकार  रखिये, हर बात पर निष्पक्ष  होकर  विचार  करिए  और आवश्यक  रीति नीति  को अपनाते  हुए  निर्णय  कीजिए, आपके  जीवन  के बहुत  से  दुःख  के कारण  दूर  हो सकते हैं।  चरैवेति चरैवेति। 

टिप्पणियाँ

  1. आपके गहन विचार के लिए बहुत-बहुत अभिवादन

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  2. धन्यवाद डा0 साहब, अनुभव हमेशा दूसरों के काम आता है, क्या पता किसी पढ़ने वाले के काम आ जाये, इसलिए लिखता हूँ

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