चिन्तन (Thinking)
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जिस समाज में वह रहता उसमें अनगिनत प्रकार के अनेक विचारों के लोग होते हैं, हम चाहते हुए भी सबको एक जैसा नहीं बना सकते हैं और स्वयं को बदलना भी कठिन होता है । दूसरों की अभिरुचि व आदतों को बदलना तो और भी कठिन है, हर व्यक्ति चाहता है ,उसके हर कार्य उसके अनुसार हो , यह एक हवाई कल्पना से अधिक कुछ नहीं है। जो ऐसी कल्पना करते हैं या इस प्रकार का सोचते हैं वे वास्तविकता से पूर्ण रूप से अपरिचित हैं, व्यक्तिगत, परिवारो, व समाज में अधिकतर समस्याए भी इसी कारण पैदा होती है , मनुष्य सामाजिक मनोविज्ञान को नहीं समझ पाता , अनावश्यक रूप से चिंतित रहने का कारण भी यही है कि जब वह अपनी कल्पना के अनुरूप समाज व दुनिया को देखना चाहता है,और वह नहीं हो पाता है तब वह परेशान या चिन्तित हो जाता है । विभिन्न प्रकृति एव आदतों वाले व्यक्तियों से जो जितना अधिक ताल मेल बिठा सकता है वह जीवन में उतना सफल रहता है, यहाँ उल्लेख करना चाहता हूं कि ताल मेल का अर्थ यह नहीं है कि किसी की अनौचित्य बातों से समझौता किया जाय, या किसी की नाजायज माग को माना जाय ,अन्यथा जो कुछ अच्छा हो रहा है वह भी धीरे धीरे समाप्त हो जायेगा। बुराईयों को दूर करने का मन से प्रयास तो होना ही चाहिए , और यदि समाप्त नहीं हो रहा है तो उसकी उपेक्षा की जानी अति आवश्यक है , और उस व्यक्ति से दूरी बनानी हितकर होगी, जो ऐसे बुरे कार्यों में संलिप्त है । हर किसी के जीवन में अच्छा करने की पर्याप्त सम्भावना होती है कि वह क्या अच्छा कर सकता या बन सकता यह उसके चिंन्तन पर निर्भर करता है । समाज में यदि खुश रहना चाहते हैं तो सामन्जस्य की आदत को विकसित किया जाना उचित होगा। दूसरों को बदलने की अपेक्षा, अपने को बदलना आसान व हितकर होगा,ध्यान यह रखना चाहिए कि चिंता को इस सीमा से आगे न बढे, जिससे कि मनोबल व मानसिक संतुलन को ही खतरा उत्पन्न होने लगे। मनोबल को किसी भी दशा में कम नहीं होना चाहिए और चिंता को उतना महत्व दिया जाना चाहिए जितना आवश्यक हो अर्थात कर्तव्य पालन करने के लिए सहायक हो । चरेवेति चरेवेति।
बहुत सुंदर प्रयास सर जी
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
जवाब देंहटाएंBahut Sundar post
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