मितव्ययता (saving)
जीवन यापन के लिए रूपये पैसों की आवश्यकता होती है, इसलिए रुपये का संबध जीवनयापन के हर क्षेत्र से है। पैसा कमाना जितना श्रमसाध्य है ,उससे अधिक कहीं उसका विवेक पूर्ण व्यय करने से है। यदि व्यय करने में मितव्ययता का ध्यान न रखा तो भविष्य में आपका और आपके उन बच्चों का जीवन कष्टदायक हो सकता है जिन्होंने पैसे को व्यय करने में मितव्ययता का ध्यान नहीं रखा है । परिवार की आवश्यकताओं को ध्यान में रखे बिना, अनैतिक कार्यों और विलासिता में व्यय करते रहना बुद्धिमत्ता नहीं मान सकते हैं। ऐसे व्यक्ति स्वार्थी या अनैतिक ही हो सकते हैं,भले ही उनकी अपनी दृष्टि में वे भले हो, पारिवारिक, सामाजिक आदर्शों की दृष्टि से ठीक नहीं हो सकते हैं। पैसे की महत्ता तब पता चलती जब कोई आर्थिक तंगी से गुजर रहा होता है। इसके विपरीत जिसको आरम्भ से कभी पैसो की कमी अनुभव नहीं हुई वह कैसे जान पायेगा कि पैसा कितना मूल्यवान होता है, जिससे बिना जीवन की गाड़ी असंतुलित होने लगती है। जो माता पिता अपने बच्चों को खुला पैसा खर्च करने के लिए देते हैं , और उनकी यह आदतों में सुमार हो जाता है, जब एक बार आदत बन जाती है तो उसमें सुधार होना या सुधार करना बहुत कठिन होता है । ठीक है बच्चों की कुछ अपनी इच्छाए व रूचियाँ होती हैं और यदि उनकी पूर्ति न की जाय तो उनके मानसिक विकास पर आघात पहुँच सकता है, इसकी पूर्ति के लिए उनको पैसों की आवश्यकता होती है। आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए पैसे देना अच्छा है , किन्तु सम्पूर्ण इच्छाओं की पूर्ति करते रहनें से हानिकारक स्थिति आ सकती है। उद्देश्यहीन खर्च करने से घर की आर्थिक स्थिति पर बुरा असर पडता है और बच्चों की आदत भी खर्चीली बनती ज़ाती है। भविष्य में यह बहुत कष्टदायक हो सकता है, जब उसको नियंत्रित करने के लिए कोशिश की जाती है, तो बच्चे अनुशासन हीन,व उद्ददण्डता अपनाते हैं। इसलिए बचपन से मितव्ययता की आदतों को सुमार किया जाना उचित होगा ,जो कि आने वाले समय में सुखद होगा। आये दिन अखबारों या मीडिया में भी यह सब सुनाई देता कि जब अभिभावक पैसे देने के लिए मना करते हैं, तो उनका पाल्य कोई बड़ा अनैतिक कार्यों को कर बैठता है। अपने बजट पर विचार किये बिना ही बच्चों को खर्च के लिए मनमाने पैसे देते रहना भी बच्चों की इच्छाओं को विकृत करना है, दिन प्रतिदिन नयी नयी इच्छाऐ पैदा होगी। माँ प्रेमवश बच्चे को पैसा दे देती है धीरे-धीरे आदत बन जाती है और यह गलत विचारों /कृत्यों की ओर भी जा सकता है, मेरा आशय यह नहीं है कि पैसा न दो अपितु आवश्यक आवश्यकताओ के लिए ही दो। प्रायः बच्चों के अभिभावक विशेषकर माता ममता के मोह का प्रदर्शन बच्चों को अधिक जेबखर्च देने में करती है। उसका विकृत मोह बच्चों को इतना विगाड देता है कि वे अनुशासन हीन होने लगते हैं। प्रारम्भ में ऐसे वातावरण में पले बच्चे भविष्य में अभिभावको के लिए भी परेशानी का कारण भी बन सकते हैं चूंकि बच्चे बड़े होने के साथ ख़र्च भी बढता और उद्दण्डता भी । इसलिए आवश्यकता के अनुरूप ही बच्चों को पैसा दिया जाना चाहिए। किसी काम को करवाने के लिए लोभ दिखाकर काम निकालना अभिभावक और बच्चों दोनों के लिए हानिकारक है , जेब खर्च देते समय बच्चों को बचत के लिए प्रोत्साहित करना उचित रहेगा । चरैवेति चरैवेति।
बहुत सुन्दर विचार
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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