सामान्य हिन्दी में क्या जानना आवश्यक है ?(सामान्य-5)
7 फरवरी २५ के ब्लाग में मैंने लिखा था, कि अधिकांश पदों के चयन हेतु प्रतियोगिता परीक्षाओं में सामान्य हिन्दी का पेपर होता है, कुछ में qualifying होता है, कुछ प्रतियोगिताओं में सामान्य हिन्दी के अंक मैरिट लिस्ट में जुड़ते हैं।, इसलिए दोनों दशाओं में ही सामान्य हिन्दी की महत्ता को कम नहीं आंका जा सकता है, । अब प्रश्न यह उठता है , सामान्य हिन्दी में क्या पढ़ा जाय , कैसे पढा जाय और क्यों पढ़ा जाय, इसमें क्या आवश्यक है इसके लिए यह ब्लॉग सभी अभिभावकों, जिनके बच्चे तैयारी कर रहे हैं व जो स्वयं तैयारी कर रहे हैं, सभी प्रतिभागियों के लिए आवश्यक हो सकता है। साथ - साथ में उन शिक्षकों को भी लाभ दायक होगा जो हिन्दी पढ़ाते हैं।उनको यह पता चल सके कि सामान्य हिन्दी में क्या पढ़ाना आवश्यक है । यहां पर मुख्य रूप से उन विषयों topic or sub topic का उल्लेख कर रहा हूं, जो आपको अवश्य पढ़ने चाहिए। हिन्दी भाषा और व्याकरण का अन्तर्सम्बन्ध, सन्धि- विचार, समास प्रकरण, उपसर्ग,प्रत्यय -प्रबन्धन, हिन्दी शब्द रूप, संज्ञा, सर्वनाम,विशेषण, क्रिया, काल, वाच्य, क्रिया विशेषण, कारक, अशुद्धि संशोधन, अर्थ उपयोगिता तथा महत्ता, हिन्दी शब्द समूह पर एक विहंगम दृष्टि, विराम चिन्ह और शब्दानुशासन,रस सम्प्रदाय, छन्द- विधान, अलंकार परिचय, सार लेखन व संक्षेपण करना, पत्र लेखन, मुहावरे और कहावते, विपरीतार्थक शब्द, पर्यायवाची, शुद्ध वाक्य चयन, अनेक शब्दों के लिए एक शब्द, समानार्थक शब्द और उनके भेद, निबन्ध, पत्र के प्रकार व लेखन , आदि का गहनता से अध्ययन की आवश्यकता होगी । इसके लिए उचित होगा कि किसी भी परीक्षा का विज्ञापन ठीक से पढ़़ा जाय , सामान्य हिन्दी का उस परीक्षा का syllabus , जिसमें आप सम्मिलित हो रहे हैं, अच्छी तरह से पढ़ा जाय और फिर अच्छी किताबों से concern करते हुए तैयारी की जाय। सामान्य हिन्दी के प्रश्न पत्र objective multiple choice में भी पूछे जाते हैं और विवरणात्मक रूप से भी लिखने के लिए पूछे जाते हैं। यह परीक्षा के पैटर्न पर निरर्धारित होता है। इसके साथ तैयारी करने वालों को -- " यदि तुम्हारे गन्तव्य मार्ग को बाधित करने के लिए हर बार नकारात्मक परिस्थितियां दस्तक दे रही हो तो पहले स्थित - प्रज्ञ बनो और कारण के मूल में प्रवेश करो। अपने भीतर से सारी सामर्थ्य को खींचकर ऊर्जा का प्रस्फुटन करो फिर समस्त अन्यथा गामिनी परिस्थितियों का क्रमशः वेधन कर, सकारात्मक सम्भावनाओं को सामने लाओ ऐसे में तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथों मे होगा अपने मन मन्दिर को कलुषित न होने दो " । चरेवेति चरेवेति।
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