समस्या समाधान

     


 आज  के    ब्लॉग  में  मैं   एक  पढ़ी   हुई  कहानी  का जिक्र  कर रहा हूँ  शायद  इससे  आपको  पता  लग जायेगा  कि यह क्यों  लिखीं  गयी है,  इसका उद्देश्य क्या है  ।  एक गाँव  में  एक वयोवृद्ध  सरपंच  रहते  थे। लोग  दूर- दूर  से अपनी  समस्याओं  के समाधान  और तकलीफ़ों  का न्याय  कराने उनके  पास आया करते थे। सरपंच  के नाम से ही उनकी  ख्याति थी। एक दिन  किसी  गाँव  से कुछ  आदमी  अपना  इन्साफ  कराने  आए। उस गाँव में  वे पहली  बार ही आए थे और सरपंच  का घर भी उन्होंने  नहीं  देखा था।इसलिए  गाँव  के समीप  पहुँचने  पर उन्होंने  नियत स्थान  पर पूछ  ताछ आरम्भ की,। एक खेत  में  चार हलवाहे खेत जोत रहे थे , उनसे  उन्होंने   पूछा- सरपंच का घर बताये  और उनके कुशल  समाचार  बताएँ। हलवाहो ने उत्तर दिया  घर तो सामने  ही है, पर वे  कुछ  सुनते  समझते  नहीं हैं । आगंतुक  असमंजस  में  पड़  गए कि यदि  सुनते- समझते ही  नहीं  तो समस्या  का  समाधान  कैसे  करेंगे  ? फिर भी उन्होंने  ने उनके  पास चलना  ही ठीक  समझा।  आगे  कुएं  पर चार महिलाएँ  पानी भरती मिली।  उनसे  भी सरपंच  जी के बारे  में  कुछ  पूछा ।उन्होंने  कहा- उनको  कुछ दीखता-भालता तो है ही नहीं,  आप व्यर्थ  जा रहे हैं। तो भी इस कौतूहल  के रहते  वे सरपंच के घर जाने से रूके नहीं। जब मकान  समीप  आ गया  तो दरवाजे  पर एक बुढ़िया  बैठी   मिलीं ।  उनसे  पूछा  सरपंच  जी का घर  यही है? उसने  तपाक  से कहा- वह तो मर गये  जाकर  क्या  करोगे  ?  आगंतुको का आश्चर्य  और भी बढ़ गया, पर वे आगे  बढ़  गये। सरपंच  जी अच्छे  खासे अपने  तख्त  पर बैठे  थें।  आगंतुकों से  कुशल  समाचार  पूछे , सत्कार  किया  और आने का कारण बताने  को कहा। आगंतुकों  ने अपनी  बात  कहने  से पहले  उनके  संबध  में  जो कहा गया है  उसका ब्योरा  बताया  और पूछा  कि लोग  आपके  बारे  में  ऐसी  बातें  क्यों  कहते हैं? सरपंच  ने कहा - मेरी बड़ी  गृहस्थी  है। उसमें  अनेक प्रकृति  के सदस्य हैं । सभी  अपनी  मांगे  बढ- चढ कर  रखते हैं। न परामर्श  मानते है,और न अनुशासन।  ऐसी  दशा  में  उनका  रुष्ट । होना  स्वाभाविक है।  चार हलवाहे  मेरे  4  बेटे  है। काम करने  से जी चुराते है और लड़ते  झगड़ते  रहते हैं। कुएं  पर जो चार  महिलाएँ  मिलीं  वे चारों  बेटों  की बहुए है  अपने अपने  जेवर, कपड़ों  के लिए,  मायके जाने  के लिए  रोज  तकरार करती  रहती हैं।  मैं  उनकी  बातों  पर ध्यान  न देकर टालता  रह्ता हूँ। बुढ़िया  जो दरवाजे  पर बैठी थी मेरी  पत्नी  है। आए दिन  तीर्थ  यात्रा  पर चलने  और घर के झंझट  छोडने की  बात  कहती है, उससे  भी मेरा  सहमत  होना  कठिन है। आगंतुकों  ने समझा  कि समस्याए  सभी  के घरों  मे  हैं, पर उनका  समाधान  आवेश  मे आकर  तत्काल  करने की बात  नहीं  सोची जा सकती  है। सहनशीलता,  दूरदर्शिता  और धैर्य  रखकर  ही उन्हें  समयानुसार  पूरा  किया जा सकता है। तथ्य  को समझने   के बाद  आगंतुकों  का भी समाधान  हो गया। उन्होंने  भी अपने  घरेलू  समस्याए इसी आधार  पर  हल  करने का निश्चय  किया।  मैं  समझता हूँ कि  इस को पढ़ने के बाद  आप सभी  समझ गये  होंगे  कि हमारे  जीवन  में भी  तरह-तरह की  समस्या  आती  रहती है, धैर्य के साथ  हल करना  होता है।  चरेवेति चरेवेति ।








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