महत्वाकांक्षा (Ambitions)
मनुष्य संसार के सभी प्राणियों में सबसे बुद्धिमान प्राणी होनेके कारण , सबसे अधिक महत्वाकांक्षी होता है , वैसे तो अच्छे से रहने व खाने या सुख भोगने की इच्छा संसार के सभी प्राणियों में पायी जाती है, लेकिन बुद्धिमान होने के कारण मनुष्य में यह अति प्रबल होती है, इसी कारण (सुखभोग) वह अनेक प्रकार के कार्यों में संलिप्त भी रहता है , ऐसा आप भी मन से महसूस करते होंगे कि, अच्छा खाना, अच्छा रहना , अच्छा पहना, अच्छा देखना , अच्छा सब कुछ हो आदि को प्राप्त करने के कर्म में मनुष्य लगा रहता है, यहाँ तक कि दूसरों से अधिक समर्थ व सम्पन्न होने की अभिलाषा में दिन रात एक करता है कभी-कभी अनेक प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं मे भी उतर जाते हैं , और विजयी होने पर गर्व दिखाते हैं । यदि चुनाव में जीत जाते हैं तो लोक सेवा की भावना कम , और हम विशेष है की भावना अधिक रहती है व अपने को विशिष्ट सिद्ध करने की आकांक्षा अधिक रहती है, जब यह मिल जाता है तो इसके जाने का डर हमेशा उन्हें सता रहा होता है , जबकि यह उसके वश में भी नहीं है । वह भूल जाते हैं कि दुनिया में कई लोग भरे पड़े हैं , उनकी तुलना में भरपूर प्रयत्न करने पर भी कदाचित अपनी बढ़ी- चढ़ी सफलता भी नगण्य समझीं जाती है, उत्साह भी तभी तक रहता है जब तक इच्छित वस्तु या स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती ।उपलब्धि के कुछ क्षण ही पानी के बुलबुले जैसा उत्साह पैदा करते हैं। इसके बाद तो जो मिलता है , उसे बनाये रखना कठिन होता है, इसी में समय व्यतीत कर रहे हैं। महत्वाकांक्षा उच्च स्तरीय अवश्य हो और होनी भी चाहिए, जिससे कि मनुष्य दूसरों का यथा उचित मार्गदर्शन कर सके, सेवा का भाव ऐसा हो कि प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष यथा सम्भव दीन दुखियों की सेवा करना व पिछड़ो को ऊंचा उठाना, व बिना स्वार्थ के लोगों के काम अवश्य करने का हो। कर्म करते रहना ही श्रेष्ठ होगा, ऐसा ही भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से पूरे संसार को उपदेश दिया है , और यदि देखा जाय तो कर्म करने पर ही फल की प्राप्ति सम्भव होती है । हर प्रकार के व्यवसायी को कर्म करना ही पड़ता है। महत्वाकांक्षा भी तभी पूर्ण होती है जब वह पूरे मनोयोग से कार्य करता है। यदि केवल महत्वाकांक्षा रखें और कोई कर्म न करें तो इच्छित वस्तु/स्थान नहीं प्राप्त कर सकते है । चरेवेति चरेवेति ।
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