आत्महीनता बहुत बड़ी कमजोरी

 


कभी  - कभी व्यक्ति अपने अन्तःकरण  में अपने आप में कई प्रकार की कमियों, कमजोरियों   आदि की कल्पना किया करता है  , कोई कल्पना करना व उसका उपयोग   करना उसके   हित तथा   अहित दोनों क्षेत्रों में सम्भव  होता  है। जब व्यक्ति आत्महीनता से ग्रस्त होता है, तो वह हमेशा नकारात्मक  (अहित में)सोचता है यह स्थिति स्वयं उसके लिए  खतरनाक है, विगत प्रतिकूल संयोग या परिस्थितियां ही उसकी धारणा को मजबूत बनाने  का काम  करती है।   कमी   की   कटु  अनुभूति बार बार अन्तःकरण को   चुभती  रहती हैं और   हम   उसे जानकार भी अनजान बने रहते हैं , या  बने रहने का प्रयत्न करते हैं। हम नहीं चाहते कि कमी का अनुभव हमें बार बार  कष्ट दे, हम भूलने का विफल प्रयास करते हैं पर मन की स्थिति विचित्र होती है, जिसको हम भूलने का प्रयास कर रहे हैं वह बार बार याद आती रहती  है, और यह हमारे   कार्यों  के साथ - साथ  स्वास्थ्य  पर भी   प्रभाव   डालती है। परिस्थिति  वश विभिन्न प्रकार के    कार्यों  के परिवर्तन,समाज  का आपके  प्रति व्यवहार  तथा   गृहस्थ  की   अनेक   समस्याओ,  के कारण   हो सकता है,  कि कुछ  समय   के लिए  यह  कमजोर पड़ जाय  पर  उसकी प्रतिकृति  हमारे  दैनिक  जीवन पर बनी  रहेगी ‌ ।   अनेक  अवसरों  पर, शोक,हर्ष, दुःख  तथा सुख, आशा,  भय , रोग, आदि  सब मनुष्य  के मन में  संचित  रहते हैं , समय  आने पर  वह मनुष्य   के  मन से  बाहर प्रदर्शित  होते  रहते हैं।  आत्महीनता   का सबसे  जो प्रमुख  कारण  यदि  देखा जाये  तो  वह  है  डर,   डर   किस कारण है  जो कि व्यक्ति  को परेशान  कर रहा है, और यह कई तरह-तरह  से हो सकता है,  उदाहरणत    यदि   कोई  व्यक्ति  निराशावादी  है  तो किसी  भी कार्य  मे   उसको     सफलता    नहीं  दिखाई  देती है,   क्योंकि  निराशावाद  सफलता  का  शत्रु है      निराशावादी  सदैव  संकल्प -विकल्प  के जाल में  फंसा  रहता है, तो ऐसे  व्यक्ति    पर  कौन  विश्वास  करेगा  ये  सोचने  वाली  बात  होगी।   निराशा  एक प्रकार की  नास्तिकता   है  जो कि  हमेशा  नकारात्मता  की ओर ले जाती है  इसलिए   कभी  भी   वह  डर  पैदा  न होने  दे , जिससे  आत्महीनता पैदा हो,  और किसी   भी आत्महीनता  का कारण  पैदा  हो ।  कभी - कभी  स्वास्थ्य, सामाजिक  स्थिति, शारीरिक   कमी, आर्थिक    व   अन्य  और  भी   डर  के    कारण  हो सकते है,   और आत्महीनता  का कारण  बन सकते  हैं ।  इसलिए  किसी  भी प्रकार का डर पैदा  न होने देंना चाहिए,  ये  व्यक्ति  के लिए सबसे  बड़ा   सम्बल  होता   है  ।  चरैवेति चरैवेति। 

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही सुंदर लेख है आपका , आपको मेरा कोटि कोटि नमन और आशा करता हूँ की आगे भी समय समय पर आपका लेख प्रकाशित हो और समाज का मार्गदर्शन आप जैसे विद्वान विभूतियों द्वारा होता रहे ऐसी मैं आपसे अपेक्षा (उम्मीद) करता हूँ।
    तहदिल से आपका धन्यवाद ।

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद, आपका 🙏

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. बहुत ही सुंदर और सार गर्वित लेख सर जी

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