मानव कर्तव्य
मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह सपाट मस्तिष्क के साथ पैदा होता है और धीरे-2 जिस वातावरण में रहता है, उसी के अनुरूप उसमें गुण/अवगुण समाहित हो जाते हैं ।वातावरण से मेरा आशय परिवार, माता-पिता, भाई-बहिन, आस-पास का पडो़स, सहपाटी, शिक्षक से है जिनके सानिध्य में उसने शिक्षा पायी है, या जिन के सम्पर्क में रहते है, आदि से है । बच्चे पर प्रराम्भिक प्रभाव घर के वातावरण का या घर पर की शिक्षा का ही परलक्षित होगा, तय मानिये कि इस में कोई शंका करने की आवश्यकता नहीं है। पुराने समय से यह बात चली आ रही है कि जब कोई परिवार अपने बच्चों को कोई रिश्ता खेाजता है तो इस बात का ख्याल रखता है कि अच्छे संस्कार/घर परिवार की लड़की/ लड़का हो। मैं समझता हॅू कि इस वाक्य में यही प्रमुख बात रही होगी कि अच्छा संस्कार युक्त ही अपने आने वाले बच्चों/पीड़ी को भी संस्कारित करेगा या काफी कुछ अच्छा/बुरा अपने आप मॉ/बाप से बच्चे में स्थानान्तरित हो जायेगा। आज हर मॉ/बाप चाहते हैं कि मेरा बच्चा सबसे अलग हो और उसमें सभी विलक्षण प्रतिभायें समाहित हों परन्तु, यह हो नही पाता है, इन्ही विन्दुओ को घ्यान में रखकर अपने अनुुभवों को समय-2 पर अपने इस ब्लाग के माघ्यम से आप सभी पाठकों के लिये प्रस्तुत करूॅगा । ये विषेशकर सभी वर्ग के पाठकों के लिये लाभदायी होगा। मनुष्य को विधाता की सर्वश्रेश्ट कृति माना गया है, जिसमें सोचने, समझने व उसको प्रकट करने की शक्ति है। जीने के लिये वह कई प्रकार के प्रयोगों के बाद उसको कार्य रूप में परणित करता है, ऐसा करने से उसकी महत्ता भी अपने आप प्रतिपादित होती है मनुष्य तभी तक दीन-हीन बना रहता है जब तक वह अपने अन्दर की प्रतिभा को पहचानता नहीं है । जिस दिन से वह अपने आप को पहचान लेगा उस दिन से वह कर्म करना प्ररारम्भ करेगा और उसका परिणाम भी उसको मिलेगा यह निशिचत है। - चरैवेति चरैवेति।

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