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ईर्ष्या (Jealous )

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       किसी भी  व्यक्ति  या मनुष्य  में  ईर्ष्या की भावना एक बहुत  बड़ी  विकृति है, जो कि एक गहरी टीस की तरह अंदर ही अंदर  व्यक्ति को पीड़ित करती रहती है  और  खोखला  करती हैं ।यह एक ऐसे  दर्दनाक  दलदल है, जो अपने  में  कितनों को  डुबोए रहता है, और आसपास के  वातावरण  को इस दुर्गंध से प्रदूषित  करती  रहती है। ईर्ष्या की गहरी  पीड़ा  सभी  प्रकार  की सुख शांति, चैन खुशी  को हरण कर लेती है  और बदले में  जलन,कुढन प्रदान करती  रहती है ।यह हमे आत्मविमुख  करती है और  पतन पराभव की अंधेरी  सुरंग में  धकेल देती है  जिससे  बाहर निकलने का  कोई  रास्ता दिखाई नहीं  देता है। आखिर ईर्ष्या  पैदा क्यो  होती है  ? आप सभी  पाठकों  का भी इसमें  अपना अपना  अनुभव  होगा, कि  इसके  पीछे का  क्या  मनोविज्ञान  है ?यह एक रोचक तथ्य है ,जिसके  जबाब इस त...

मौन रहना या न रहना, (To be silent or not to be silent)

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        कभी-कभी  हम बहुत  बोलते हैं  और कभी-कभी  चुप रहते हैं  और कभी-कभी  अनावश्यक  भी बात कर लेते हैं , यह सभी  दशाओं  में   उचित  नहीं  कहा जा सकता है।वैसे  मौन  ,  तो  मन की आदर्श  अवस्था  कही जा सकती है ,मन की चंचलता यदि  समाप्त  हो जाय   तो मन अपने आप  मौन की स्थिति  में  आ जाता है और  अजीब सुखद स्थिति  अनुभव  होती है।मौन से मानसिक  ऊर्जा  का क्षरण को रोककर  इसे मानसिक  शक्तियों  के विकास  एवं वर्द्धन  में  नियोजित  किया जा सकता है। मौन  चुप या शांत  रहना  नहीं  बल्कि  अनावश्यक  विचारों  के उधेडबुन से मुक्ति  पाना है। चुप रहने  को यदि  मौन की संज्ञा  दी जातीं है  तो समझना चाहिए  कि इसके मर्म  एवं  तथ्य  से हम बहुत  दूर हैं। सामान्यत  व्यक्ति  बोलकर  जितना  मानसिक  ऊर...

उत्तराखंड की स्थायी राजधानी (Permanent Capital of uttrakhand)

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        कहते हैं कि आवश्यकता आविष्कार  की जननी है, जब कभी  मावव  जाति को किसी चीज  की आवश्यकता हुई  ,तो उसका  आविष्कार  होता  चला गया है,  और अभी  भी आविष्कार  हो ही रहे हैं  और मैं  समझता हूँ कि  आगे   भी  तब तक होते  रहेंगे  ,जब तक इस भूमि  पर मानव जाति  रहेगी।  आविष्कार   विकास   का संकेत  है  कहे,  तो इसमें  कोई  गलत नहीं है।  एक समय था,  जब पर्वतीय  क्षेत्र  के लोग  छोटे - बड़े  कार्यो के लिए  लखनऊ  की  दौड़  लगाते  ,  निसन्देह  जाना ही पड़ता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजधानी  लखनऊ थी और यह  पर्वतीय क्षेत्र , उत्तराखंड  भी ,उत्तर प्रदेश   में  सम्मिलित था। इस पर भी उत्तराखंड  की विषम  विशेष भौगोलिक  बनावट  जो कि दैनिक  कार्यों  के सम्पादन  में  सबसे  बड़ी  रुकावट...

मनोबल (Morale)

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         संसार में  अनेकों  परस्पर  विरोधी  प्रचलनो की भरमार है, यह एक विडम्बना ही है  कि हम अपना  महत्व  न समझ कर  दूसरे के  अधीन  परावलम्बी बन जाते हैं  उनमें  से किसी को   हम स्वीकार कर लेते हैं, उसमें  उन प्रतिपादनो की नहीं,  हमारी  चयन बुद्धि, वातावरण  एवं  पूर्वाग्रह  के आधार  पर बनी हुई   हमारी  अभिरूचि को ही श्रेय जाता है।  अस्तु  प्रधानता  प्रतिपादन की नहीं है  अपितु  अपनी  अभिरूचि या विचार  क्षमता  की ही रही। यदि  उस वातावरण  से अपना  सम्बन्ध  उतना  घनिष्ठ  न होता  तो वातावरण  का प्रभाव  हमारे  मानस  पटल की दूसरी  स्थिति  भी बना  सकता  था। तब कदाचित्  हम उस भिन्न प्रचलन  के अनुयायी  रहे  होते, किन्तु  देखा गया  है कि हमारी  मान्यताओ  और अनुभूतियों  में  अन्तर आ जाने  ...

शिक्षा का आधुनिकीकरण व मानसिक विकास(Modernization of education and Mental development)

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            आज के तेजी से बदलते समय में शिक्षा का  स्वरूप  भी बदल चुका है पारंपरिक शिक्षा पद्धतियों के मुकाबले, आधुनिक शिक्षा न केवल किताबों तक सीमित रह गई है, बल्कि यह बच्चों के समग्र मानसिक विकास को ध्यान में रखते हुए अधिक संतुलित और समग्र दृष्टिकोण अपनाती है। यह बच्चों की सोचने की क्षमता, रचनात्मकता और समस्या समाधान की योग्यता को बढ़ावा देती है ।  एक नया दृष्टिकोण  आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ बच्चों को ज्ञान देना नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और सृजनात्मक बनाना है। आज की शिक्षा में तकनीकी, सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक विकास की पूरी पहलू पर ध्यान दिया जाता है। यह शिक्षा पद्धति बच्चों को जीवन कौशल, समग्र सोच, और करियर विकल्पों के लिए तैयार करने पर ध्यान केंद्रित करती है,    आधुनिक शिक्षा बच्चों को समूह कार्य, चर्चा, और सहयोगी प्रोजेक्ट्स के माध्यम से टीमवर्क की अहमियत सिखाती है।  बच्चे अब केवल तथ्य नहीं पढ़ते, बल्कि उनके दिमाग को चुनौती दी जाती है कि वे किसी भी समस्या का समाधान रचनात्मक तरीके से सोचें...